
Friday, November 06, 2009
Wednesday, September 05, 2007
"Apni Jeet Ho": A Collection of Motivational Articals By Dr. Sanjay Sharma
APNI JEET HO is recently published book of Dr. Sanjay Sharma, who is a renowned motivational management guru.He is also Head, Motive Plan which is a movement for motivational management awareness among people especially among the youth. It is started by keeping this view in mind that the youth of the present age is in very hurry and want to achieve SUCCESS at earliest without taking much pain, without any clear strategic planning and hard work. So, a right direction is very much required for them and Motive Plan takes this challenge to train the brain for strain to plan their own motive to be a leader. We organize special Seminars and Motivational talks for students, growing up professionals and organization heads for their own benefits and for the benefits of the society.
Our key-speaker is Dr. Sanjay Sharma, who himself is a very well known author and motivational speaker from last twenty years. He delivers motivational seminars on various topics including ; Self Confidence, Time Management, Self respect, Stress management, Body Language, Communication Skills, Positive Attitude, Leadership etc. You can contact us for his motivational talks. He can also design the seminars and workshops for your specific professional needs.
Also , recently Motive Plan published a book of Dr. Sanjay Sharma entitled, APNI JEET HO which is a very nice collection of his motivational articles. You can contact us for the same.
We offer very handsome discount on bulk purchase ( i.e. more than 25 copies).
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Thank you.
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Tuesday, January 16, 2007
कहानी: " हॆप्पी न्यू ईयर"
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"हॆप्पी न्यू ईयर"
-संजय विद्रोही
उन दिनों ऑफिस में मदान साहब की तूती बोलती थी। मदान साहब ईस्ट इंडिया कम्पनी के फार्मूले ‘फूट डालो-राज करो' को प्रशासन का अचूक हथियार मानते थे। यह मंत्र उनके लिए बिजनेस का कायदा था और जीने का ढंग । किसको कितनी ढील देनी है और किसको कितना ‘भाव' ये वो अच्छी तरह जानते थे। रोब उनका ऐसा कि बस पूछो मत। ताड़ने और हॉंकने के मामले में पक्के ‘कांईये' और पूरे ‘फेंकू'। अनिच्छित व्यक्ति अगर काम से भी आ बैठे तो जानबूझ कर अपने आप को अन्य कार्यों में व्यस्त कर लेना और बातों के जवाब में सिर्फ ‘हॉं-हुँ' करते रहना उनकी ‘टालने की कला' थी। बेचारा आने वाला तब हार कर कहता ‘अच्छा सर मैं चलता हूँ' तो तपाक से बोल पड़ते ‘ओके ओके'। आदमी बेचारा अपना सा मुँह लेकर लौट जाता। जबकि कई दफा ‘चमचा टोली' के लोग अनावश्यक ही उनके पास ठठ्ठ लगा कर बैठे रहते और चाय समोसों का दौर चलता रहता। मदान साहब तब चमचों की बातों पर हो-हो कर के दॉंत निपोरते नहीं अघाते।
जब कभी वो राऊण्ड पर निकलते तो मानो कॉरिडोर में कर्फ्यू लग जाता। एरिया मैनेजरों को एक साथ खडे हो कर गपियाते देख लेते तो उनकी नजर चश्मे के भीतर भी टेढी हो जाती। तब वो लोग बेचारे कई दिनों तक एक साथ नहीं दिखाई पड़ते थे। और भूले से अगर दिख भी जाते तो तुरन्त अपने काम धंधे में लग जाते। मदान साहब ऑफिस के हर आदमी के बारे में ‘खुफिया जानकारियॉं' लेते रहते थे और इस काम में उनकी चमचा टोली खूब बढ चढ कर अपनी ‘डयूटी' पूरा करती थी। कई दफा तो बात में नमक मिर्च लगा कर अच्छी जायकेदार बना कर मदान साहब के सामने सुनाई जाती और अन्य ‘सहगोत्री' चमचे हॉं में हॉं मिलाकर बात पर सच्चाई की मोहर लगा देते। कई सीधे-सादे लोग इस तरह आये दिन चमचा टोली के ‘अधिकारिक वक्तव्यों' की बली चढ जाते। मदान साहब सारे तमाशे को खूब एन्जॉय करते । उनकी इस विशिष्ट कार्यशैली के परिणाम भी आफिस में नजर आने लगे। किसी को आधा टारगेट अचीव करने पर ही भारी इन्क्रीमेण्ट मिलने लगा और किसी को टारगेट से ज्यादा अचीव करने पर भी कोरा ‘वेरी गुड'। नतीजतन ऑफिस में ‘खबरचियों' की नई खेंप तैयार होने लगी। जो जितना बडा ‘खबरची' वो बॉस का उतना बडा हितैसी और उतना ज्यादा प्रिय।कहने की आवश्यकता नहीं कि उसका उतना ही भारी इन्क्रीमेण्ट। लगाई -बुझाई से दूर रहने वाले भी अब इस ‘एकस्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटि' में गहरी दिलचस्पी लेते दिखाई देने लगे। ऑफिस का माहौल बडा बेढब हो चला था। कौन,कब,क्या कर बैठे ?कोई नहीं जानता था। आये दिन लोग पाळा बदलते दिखने लगे।
दिसम्बर का आखिरी पखवाडा चल रहा था। सब लोग साल की आखिरी रात को अपने अपने अंदाज से सेलिब्रैट करने वाले थे। आजकल सब लोग बस इसी प्लानिंग में लगे रहते थे। जरा फुरसत पाई नहीं कि लगे हवा में किले खडे करने। कोई पत्नी के साथ तो कोई गर्लफ्रैण्ड के साथ । कोई घर में तो कोई शराबघर में ।नये साल के स्वागत को हर कोई तत्पर जान पडता था। आज भी लंच के बाद लगे मजमे में इसी टॉपिक पर डिस्कशन चल रहा था। तभी चपरासी हाथ में एक टाईप किया हुआ कागज लेकर हॉल में अवतरित हुआ। उसकी निगाहें किसी को ढूंढ रही थी। प्रजापत को देखते ही वो मुस्कुरा दिया और आगे बढकर उसके हाथ में ‘वो कागज' देकर चलता बना। सब एकसाथ प्रजापत के पास जा पहुँचे ये देखने कि आखिर चपरासी क्या देकर गया है। किन्तु ये जानकर कि मदान साहब ने दिनेश प्रजापत का ‘एक्सप्लेनेशन' कॉल किया है तुरन्त ही सब तितर बितर हो गये। ‘न्यू ईयर सेलिब्रैसन' की चर्चाऍं एकाएक फुर्र हो गई। सब अपनी अपनी टेबिल पर जाकर काम में मुँह देकर बैठ गये।
दिनेश जैसे दब्बू किन्तु काम के प्रति सीरियस रहने वाला कैसे मदान की चपेट में आ गया ?जानकर मुझे बडी हैरानी हुई। उस पर अपनी कम्पनी का ‘डाटा' दूसरी प्रतिस्पर्धी कम्पनी के साथ शेयर करने का आरोप लगाया गया था। प्रजापत ने रो-रो कर बुरा हाल कर लिया था। जिससे और कुछ नहीं मगर ये जरूर जाहिर हो रहा था कि बन्दा बेकसूर है और किसी की कच्ची ‘खबर' पर उसको बलि का बकरा बनाया जा रहा है। मैंने उसको ढाढस बॅंधाया और " चिन्ता मत कर,कोई रास्ता निकाल लेंगे।" कहकर उसको सॉंत्वना दी। उस दिन शाम को दफ्तर से हम साथ ही निकले। मैं उन दिनों कुँवारा था और जवाहरनगर में एक मकान के गैराज पोर्शन में रहता था। मालिक मकान दुबई गया हुआ था कमाने और मालकिन अपने बच्चों के साथ अकेली यहॉं रहती थी,प्रवासी भारतीय की अप्रवासी पत्नी बेचारी। मेनगेट की एक अतिरिक्त चाबी मैंने बनवा रखी थी। सो खा-पीकर रात देर से लौटने में कोई असुविधा नहीं होती थी। तिस पर मकान मालकिन से भी थोडा ‘तारतम्य' था । सो किसी किस्म की तकलीफ नहीं थी मुझको वहॉं।उ स दिन प्रजापत को मैं अपने साथ ही ले गया। वो भी इस शहर में अकेला ही था। अकेला रहेगा तो ज्यादा सोच विचार करेगा,इसी विचार से मैंने उसको अपने साथ ले लिया था।
करीब घण्टे भर की समझाईश के बाद जाकर कहीं वो नॉर्मल हो पाया था। नौ बजे के लगभग हम डिनर करने के लिए निकले। मैं अक्सर राजापार्क में ही खाना खाता हूँ। नजदीक पडता है। सो पैदल ही निकल पडे। अभी ढाबे से काफी दूर थे कि अचानक प्रजापत बोल पडा " सक्सेना आज मूड ठीक नहीं है। एक-एक पैग हो जाए तो कैसा रहे?" अँधे को क्या चाहिए? दो ऑंखें। मैं झट तैयार "नेकी और पूछ पूछ।"
अब हम खाने की बजाय पीने की जुगाड में लग गए। एक रिक्शा किया गया और शाही अंदाज में उसको निर्देश दिया गया " रोशन बार चलो।"
एक-एक पैग से चल कर दौर तीन-तीन पैग तक जा पहुंचा। प्रजापत की ऑंखें चमकने लगी और वो आत्मसम्मान से लबरेज हो उठा " वो साला समझता क्या है अपने आप को? सक्सेना तुम अगर जरा सा सहारा लगा दो तो मैं साले की एसी-तैसी कर के रख दूँ।" मैं भी कुछ कम विद्रोही नहीं हुआ जा रहा था। फौरन बोला " उठो आज उसके घर चलते हैं। वहीं साले की मॉं-बहन एक करेंगे। अपना हुलिया नहीं पहचान पाएगा साला आईने में।"
" मगर सक्सेना अगर उसने हमसे बात करने से मना कर दिया तो ?" प्रजापत ने संदेह जताया।
" कैसे मना कर देगा?कोई मजाक है? डरता क्यूँ है साले? मैं हूँ ना साथ में।"
" वो और नाराज हो गया तो?" प्रजापत अब डरने लगा था। पल भर पहले शेर की तरह दहाडने वाला प्रजापत मेमने की तरह मिमियाने लगा था।
" तू साले हिजडा है क्या? तुझ जैसे कस्सी लोगों ने ही तो उसको खुला सांड बना दिया है। वरना क्या मजाल वो चूं भी कर जाए?जानता नहीं क्या कि हमारी खून-पसीने की कमाई पर ही वो एयरकंडिशनर की हवा खा रहा है। उसको साले को क्या पता कि फिल्ड में काम कैसे होता है?" मैं पूरी तरह तरंग में था और ‘करो या मरो' का बिगुल फूंकने की ठान चुका था।
"लेकिन उसने कुछ कह दिया तो?" वो अब भी सहम रहा था।
" तू डर मत यार। मेरे साथ चल बिंदास।"
" चल ठीक है। फिर जो कुछ बोलना है तू ही बोलना। मैं तो हॉं में हॉं भर दूँगा बस।" उसने तपाक से कहा और मैंने "हो" कहते हुए हामी भर दी।मदान का घर राजापार्क से ज्यादा दूर नहीं था। बार से बाहर आ कर हमने एक रिक्शा पकडा और थोडी ही देर बाद हम बापूनगर स्थित मदान साहब के घर के सामने थे। घर के बाहर एक कॉल बेल लगी थी। किन्तु बजाए उसको बजाने के, हम लगे दरवाजे को जोरों से पीटने और पीटते ही गए जब तक कि ‘भडाक' से दरवाजा खुल नहीं गया।दरवाजे पर मिसेज मदान थी ‘बोलिए।'
"मदान साहब से मिलना था।" मैं किंचित मुँह पर हाथ रख कर बोला। कहीं शराब की बदबू ना आ जाए।
" वो तो सो गए।" मिसेज मदान ने बडा सपाट-सा उत्तर दिया।
"ठीक है" मैं भी आग्याकारी बालक की तरह वापस पलट गया। मिसेज मदान दरवाजा बंद करने लगी । ना जाने मुझे क्या हुआ मैं वापस मुडा और किंचित ऊँची आवाज में बोला " जगा दिजिए। कहिए सक्सेना आया है।" मानो सक्सेना ना हुआ, कोई पीएम हो गया। मैं झौंक में था। पीछे मुड कर देखा प्रजापत दुबका जा रहा था सहमे हुए मेमने-सा। ऑंखों से उसको घुडकाया तो वो थोडा खिसक कर आगे हो गया। पर बोला कुछ नहीं। मिसेज मदान दरवाजा खुला छोड कर अन्दर बढ गई थी और मैं घुस कर हॉल में पडे सोफे पर जा कर पसर गया। ईशारे से प्रजापत को भी बुला लिया। वो भी पॉंव समेट कर पास ही एक कुर्सी पर बैठ गया। थोडी ही देर बाद मदान साहब प्रकट हुए। मंहगा नाईट सूट पहने वो बिल्कुल फ्रैश लग रहे थे और साफ लग रहा था कि वो चाहे जो भी कर रहे हों सो तो नहीं रहे थे। हॉं आने जाने वालों के लिए टालने का बहाना अच्छा है कि ‘साहब सो रहे हैं।'
‘कहो' उन्होंने बैठते हुए पूछा। साथ में बैठे प्रजापत को देखकर वो सारी रामकथा समझ गए। घूर कर उन्होंने प्रजापत को देखा भर, वो सहम गया। उसकी टॉंगें कांप रही थी और सारा नशा हिरण हो चुका था।
‘क्या काम था इतनी रात गए?' उन्होंने फिर पूछा।
‘कुछ खास नहीं। बस यूँ ही थोडा डिस्कशन करना था। सो चले आए और क्या?' मुझे कुछ और नहीं सूझा।
‘बोलो क्या डिस्कशन करना है?'
‘यही कि ऑफिस का माहौल ठीक नहीं है' मैंने बात शुरू की।
‘क्यों ?क्या हुआ ऑफिस के माहौल को?' मदान साहब बिल्कुल नॉर्मल थे।
‘होना क्या है? आप आजकल किसी की सही बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं। कुछ ‘स्वार्थी‘ लोगों ने आफिस को खेमेबाजी का अडडा बना रखा है। चुगलखोरों की बातों में आकर एसे निर्णय लिए जा रहे हैं, जिनसे शरीफ लोगों का जीना मुहाल हो गया है। इस प्रजापत का क्या कसूर था? जरा बताईये। मुझ में अचानक जाने कहॉं से शक्ति फूट पडी।
‘तुम नाहक ही इसकी तरफदारी कर रहे हो सक्सेना। मुझे ऑथेंटिक रिपोर्ट मिली है कि यह आदमी हमारे ‘डाटा-बेस' को दूसरी कम्पनी से शेयर कर रहा है।'
‘कौन है आपका ऑथेंटिक रिपोर्टर? वो गुप्ता जो एक एक चाय के लिए लोगों के गले पडता रहता है या वो अरोडा जो आपके पीछे से आपकी पत्नी के बारे में चटखाारे ले लेकर भददी-भददी बातें करता है। या वो सिंघल जिसकी लडकी आपके छोटू को पढाती है। किस ऑथेंटिक रिपोर्टर की बात कर रहे हैं आप?' मुझ पर ‘सुरा' पूरी तरह से हावी थी। मानो आरपार की लडाई के मूड में था।
‘मैं तुम्हें कोई एक्सप्लेनेशन देने की जरूरत नहीं समझता। किंतु मैं किसी भी केस को ऊपर रिकमण्ड करने से पहले खुद तसल्ली कर लेता हूँ ,तभी कोई एक्शन लेता हूँ। समझे?'
‘आप जानते हैं ,लोग आपकी कम्पनी में काम करना नहीं चाहते।'
‘कौन कहता है?'
‘कौन नहीं कहता ये पूछिए?' सुनकर मदान साहब सकपका गए।
‘आप जितनी तनख्वाह देते हैं ना ,उतने का तो अलाऊन्स उठा लेते हैं अन्य कम्पनियों वाले। चुगलखोरी के माहौल में कोई कैसे रह पाएगा तब?एसे में आपके यहॉं नौकरी करना घटी दरों पर बेगार करना नहीं तो और क्या हुआ? बताईये।' मैं घोडे पर सवार था फुल और आज ‘सम्पूर्ण स्वराज' की घोषणा करने पर आमादा था। प्रजापत जस का तस बुत बना बैठा था। मानो काठ मर गया हो।
‘तुम चाहते क्या हो? स्पष्ट बताओ।' मदान बोला। मदान साहब का ‘साहब' भी दारू की भेंट चढ़ गया।
‘प्रजापत के खिलाफ जो आरोप पत्र आपने निकाला है, उसको आप वापस लें बस।'
‘नहीं तो?'
‘नहीं तो मैं, नहीं हम दोनों नौकरी छोड देंगे। कल अपनी मेज पर हमारा रेजिगनेशन देख लेना। लात मारते हैं एसी नौकरी को जहॉं आत्मसम्मान चमचागिरी का मुखापेक्षी हो।' कहते हुए मैंने जेब से रजनीगंधा का जिपर-पाऊच निकाला और दो तीन चम्मच एक साथ फॉंक गया। मेरी बात सुनकर मदान लाल पीला नहीं हुआ जैसा वो अक्सर हो जाता है। वो शांत बना रहा और मेरी तरफ मुस्कुराकर देखते हुए बोला ‘तुम एक काबिल प्रोफेशनल हो सक्सेना। किसी बात की तह में जाए बगैर सिर्फ भावनाओं में बह कर फटे में पॉंव घुसा देना तुमको शोभा नहीं देता। तुम्हें असल बात मालूम नहीं है अभी।'
‘मालूम नहीं है तो आप बता दीजिए ना।' मैं पूरे जोश में था और आज प्रजापत को न्याय दिलाकर उठने की ठान कर आया था।
‘जोशी को तो तुम जानते ही हो। उसकी आजकल कम्पनी की पब्लिक रिलेशन ऑफिसर दीपाली बरूआ के साथ कुछ ज्यादा ही देखादेखी चल रही है। दोनों घण्टों ऑफिस में बतियाते हैं। प्रेमालाप में लीन रहते हैं।'
‘तो इसमें इस गरीब का क्या लेनादेना?' मैं बीच ही में बोल पडा।
‘सुनो तो।दफ्तर में उनका जी नहीं भरता तो वे लोग शहर में मिलते हैं। और शहर में मोज-मस्ती करने के लिए ये आपके मित्र महानुभाव उन्हें अपना आवास उपलब्ध कराते हैं। बदले में जोशी इनकी मिटिंग दूसरी कम्पनी के मैनेजर से कराता है। क्या है ये सब? बताओ।' मदान एकाएक ऊँची आवाज में बोलने लगा। सुनकर प्रजापत तो पत्ते की तरह कॉंपने लगा।लेकिन मैंने तुरन्त प्रतिवाद किया ‘किसी के घर आना-जाना कोई जुर्म तो नहीं है। आप भी अपने कलिग्स के घर आते-जाते होंगे। लोग भी आप के घर आते-जाते होंगे। इस मामले में आपकी दखलंदाजी बिल्कुल नाकाबिले बर्दाश्त होगी। तब किस तरह प्रजापत दोषी हुआ। बताऍं।रही बात उनके बीच चल रही देखादेखी की। सो उसमें ना आप कुछ कर सकते हैं ना मैं। जोशी और दीपाली बच्चे तो हैं नहीं कि उनको कुछ कहा जाए। वैसे भी प्यार करना कोई जुर्म तो है नहीं हमारे मुल्क में। उन्हें अपना निजी जीवन अपनी मरजी से जीने का पूरा हक है। हॉं,दूसरी कम्पनी वाली बात अवश्य ही विचारणीय है। किन्तु वो आपके लिए भी विचारणीय है। आप क्यों नहीं आत्म निरीक्षण करते कि क्या वजह है कि जो प्रजापत जैसा दब्बू आदमी भी ‘स्विच ओवर' करने कि सोच रहा है और दूसरी कम्पनी के मैनेजर से मीटिंग कर रहा है?' मैं आज पूरा प्रवचन झाडने के मूड में था।
‘अच्छा चलो तुम्हारी बात मान लेता हूँ। तो क्या तुम दोनों मेरी एक बात मानोगे।'मदान ने मुस्कुराते हुए पल्टी मारी।
‘क्या?' हम दोनों के मुँह से एक साथ बेसाख्ता निकला। इतनी देर में पहली बार प्रजापत के मुँह से बोल फूटा था।
‘मैनेजमेण्ट जोशी के काम से कुछ खास खुश नहीं है ,तुम तो जानते ही हो।काम में उसकी दिलचस्पी जरा भी नहीं है। इश्कमिजाजी जरा ज्यादा है। अगर तुम दोनों उसके खिलाफ एक बढिया सी कम्पलेण्ट लिख कर मुझे दे दो तो मैं तुम्हारा साथ दूँगा। बदले में प्रजापत का एकसप्लेनेशन वापस हो जाएगा और तुम्हारा इंक्रिमेण्ट। आफ्टर ऑल यू आर ए डिजर्विंग कैण्डडेट।' मदान ने आखिर अपने पत्ते मेरे सामने खोल ही दिए।
‘हम एसा गिरा हुआ काम नहीं कर सकते। क्यों करें ?जाति तौर पर हमको उनसे क्या तकलीफ है?कम से कम मुझको तो नहीं. और इस प्रजापत को भी क्या हो सकती है? क्यों बे?' मैं तैश खा गया। प्रजापत काठ के उल्लू की तरह जस का तस खडा था।
‘तब फिर यहॉं क्यों खडे हो?' मदान ने साफ शब्दों में हम पर अपनी मंशा जता दी थी। मतलब साफ था कि या तो उसका साथ दो नहीं तो भुगतो। सुनकर प्रजापत के तो माथे पर पसीना चमकने लगा। मैं एक झटके के साथ खडा हो गया और ‘मदान साहब नमस्ते। जिन्दा रहे तो मिलेंगे' कहकर चल पडा। प्रजापत मेरे पीछे पीछे।
दूसरे दिन, मैं अपने केबिन में बैठा अभी गई रात की घटना के बारे में ही सोच रहा था कि तभी पिऊन आया और ‘मदान साहब बुला रहे हैं।' कहकर चलता बना। सुनकर अपन तो कल की घटना को याद करके मारे आशंका के एक बार तो घबरा गए। लेकिन फिर सोचा देखा जाएगा । चलो।
मदान साहब ने मेरे आते ही चपरासी को बुला कर चाय का आर्डर दे दिया और साथ में कुछ बिस्कुट नमकीन ले आने की भी ताकीद की। चपरासी भी आज आश्चर्यचकित था। मदान के चेहरे की मुस्कुराहट को देखकर मुझे नहीं लगता था कि वो कल रात की बात को ‘डिस्कस' करना चाहता है। फिर मुझे क्यों बुलाया है सुबहा सुबह बग्रै किसी कारण के? मैं अजीब पशोपेश में था। आखिर मैंने ही पूछ डाला ‘जी सरा। कहिए।'
‘कहना क्या है भई? हमसे तो अकेले अब ये आफिस सम्हलता नहीं है। क्या क्या देखें हम? हम चाहते हैं कि तुम कुछ हमारी मदद करो। आफिस की कुछ रिस्पांसिबिलिटी तुम से शेयर करना चाहते हैं। आफ्टर ऑल यू आर ए डिजर्विंग कैण्डडेट एण्ड सीनियर पर्सन।' वो कुटिलता से मुस्कुरा रहा था।
‘आदेश करें सर।' मैं अतिरिक्त विनम्र था । ना जाने क्यों?
‘आदेश नहीं सक्सेना। तुम इतने सीनियर हो तुमसे तो मैं रिक्वेस्ट ही कर सकता हूँ।ऊपर वालों ने कुछ कम्पीटेण्ट आफिसर्स के नाम मॉंगे हैं मुझसे । जिन्हें असिस्टेण्ट मैनेजर के प्रमोशन के लिए कन्सिडर किया जा सके। सिनियेरिटी के हिसाब से तो दो तीन लोग हैं आफिस में। किन्तु मेरे जेहन में सिर्फ तुम्हारा ही नाम है। क्योंकि तुम ‘डिजर्विंग' तो हो ही ‘कम्पीटेण्ट' भी हो। लोग तुम्हारी बात मानते हैं और स्टाफ तुम्हारी ईज्ज्त करता है। तुम्हारे एक ईशारे पर काम होता है ,ये मैं जानता हूँ। आफिस भर में तुमसा कोई ओर नजर नहीं आता मुझको।' उसने बडी कुटिलता से मुस्कुराते हुए बुलाने का म्तांव्य साफ किया। चाय बिस्कुट आ चुके थे।
‘जी मुझे क्या करना होगा?'मैंने चाय की घूँट भरते हुए पूछा।
‘करना कुछ नहीं है। इस सारी प्रक्रिया में एक अडचन आ रही है, बस।'
‘क्या?'
‘जोशी। वो भी इस प्रमोशन का दावेदार है। उसका अनुभव तुमसे दो साल ज्यादा है।जिस कारण टॉप मैनेजमेण्ट जोशी के लिए ज्यादा ‘कीन' है। पर मैं जानता हूँ कि वो कितना निकम्मा है। सिर्फ सर्विस पीरियड बढ जाने से कोई ज्यादा काबिल थोडे ही हो जाता है। तिस पर मैं ये भी जानता हूँ कि प्रमोशन की तुमको ज्यादा जरूरत है। तुम्हें अपनी बहन की शादी करनी है तुम्हारा छोटा भाई मथुरा में इंजिनियरिंग की पढाई कर रहा है गॉंव में तुम्हारे बूढ़े मॉं बाप भी हैं। और फिर तुमको अपने बारे में भी तो सोचना है ,शादी ब्याह करना है कि नहीं ? या जिन्दगी भर ‘अप्रवासी मकान मालकिन' का किरायेदार बने रहना है? बोलो। इसलिए मैं पर्सनली तुम्हें प्रमोट कराना चाहता हूँ। यू नो मेरी रिकमण्डेशन पर ही सब डिपेण्ड करेगा।' मदान अपने असली चोले में आता जा रहा था। उसकी मुस्कुराहट से कमीनगी साफ झलक रही थी।
‘लेकिन¼' मैं रात की बात को अभी भूला नहीं था।
‘लेकिन वेकिन क्या? मुझे पता है तुम दिल के बहुत साफ हो। कल रात भी तुमने जो कुछ किया वो प्रजापत की मदद करने के लिहाज से ही किया था। इसलिए मैंने उस सब का कुछ बुरा नहीं माना। वरना किसी की क्या मजाल कि मदान के सामने इतने ऊँचे सुर में बोल जाए? नौकरी से हाथ धोना पड़ जाए सो अलग। चक्की और पिसवा दूँ,दो मिनट में।' मुस्कुराते हुए उसने मेरे सम्मुख अपनी सामर्थ्य का और मेरी विवशता का एक ही झटके में खुलासा कर दिया था। वाकई वो बडा घाघ था, आज मैं साफ देख रहा था। मैं चुप ही रहा। कुछ बोला नहीं।
‘जी मुझे क्या करना होगा?' मैंने कुछ देर बाद पुन: दोहराया।
‘कुछ नहीं। बस जोशी के खिलाफ एक बढिया-सी कम्पलेण्ट तैयार कर के उस पर दस-बीस लोगों के साईन करवा दो। बाकी सब मैं देख लूँगा। क्या है कि सब लोगों पर तुम्हारा बडा दबदबा है। लोग तुम्हें मना नहीं करेंगे। मैं उसी कागज पर अपना कमेण्ट लिखकर हैड ऑफिस भेज दूँगा। उसके बाद तुम्हारे प्रमोशन में कोई रोडा नहीं रहेगा।' उसने मेरी तरफ ऑंख मिचकाते हुए कुटिलता से फुसफुसाया।
‘सर,एक तरफ आप मुझे ‘डिजर्विंग' और ‘कम्पीटेण्ट' कहते हैं और दूसरी तरफ मुझसे ऐसा कार्य करने को कहते हैं। मैंने कल रात ही आपको मना कर दिया था कि मुझसे ऐसा नहीं हो सकेगा। जोशी जी ने मेरा क्या बिगाडा है? बल्कि जब मैं इस शहर में नया नया आया था तब उन्होंने मेरी मदद ही की थी। उस मदद का बदला मैं इस तरह दूँगा। ऐसा आपको क्यों लगता है? मैं ऐसा कतई नहीं कर पाऊँगा।'मैंने किंचित रोष के साथ कहा।
‘देखो मदद-वदद तो कोई भी कर सकता है,प्रमोशन कोई भी थोडे ही दिला सकता है। और फिर तुम ये क्यों भूलते हो कि हम खुद तुमको इस काम के लिए कह रहे है। मदान खुद। सोचो जरा।' उसने कुटिलता से फिर ऑंख दबा दी।
‘सॉरी सर। आपने गलत आदमी को चुना है, बस। मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता। चलता हूँ।' मैं कहता हुआ उठने लगा।
‘सक्सेना ! ये काम तुम नहीं करोगे तो कोई और करेगा। मदान एक बार जो ठान लेता है वो कर के मानता है।' वो बुरी तरह तिलमिला उठा। क्रोध के मारे उसका चेहरा तमतमा गया। मैं बगैर कुछ बोले केबिन से बाहर निकल गया।
आ के सीट पर बैठा ही था कि प्रजापत पास आ बैठा ‘क्या कह रहा था ?'
‘कुछ नहीं । वही ,जोशी का रोना रो रहा था।' मैंने छोटा-सा जवाब दिया। इतने में ही पिऊन फिर से मेरी टेबिल के सामने आ खडा हुआ। ‘क्या है?' मैंने जोर से पूछा।
‘परजापत जी, साब बुला रहे हैं।' उसने जरा हिकारत से बिना मेरी ओर देखे प्रजापत से कहा। प्रजापत सिर पर पैर रख कर भागा। मूड ऑफ था। सो मैं उस दिन हॉफ-डे लेकर घर चला आया।
प्रजापत आजकल खुश रहने लगा था। उसने मदान से माफी मॉंग ली थी और भविष्य में अनुशासन में रहने का भरोसा भी दिलाया था। उसका ‘एक्सप्लेनेशन' भी कैंसिल हो गया था। मदान की मण्डली में भी वो अक्सर बैठा दिखाई देने लगा था। प्रजापत को खुश देखकर मैं भी मन ही मन खुश था कि चलो एक शरीफ आदमी ‘झमेले' में पडने से बच गया।
फिर एक दिन आफिस में घुसते ही प्रजापत ने मिठाई का डब्बा सामने कर दिया। मैंने प्रश्निल भाव से पूछा ‘किस खुशी में? '
वो तपाक से बोला ‘हैप्पी न्यू ईयर।'
‘सेम टू यू।' अचानक मुझे याद आया कि आज तो नया साल है।
‘एक पीस और ले सक्सेना।' प्रजापत ने पुन: डब्बा मेरी और बढाते हुए कहा।
‘बस यार।'
‘ले तो सही।' इस बार उसकी आवाज में मनुहार थी।
‘आखिर बात क्या है? बडा खुश दिखाई दे रहा है आज।' मैंने दूसरा पीस उठाते हुए पूछा।
‘प्रमोशन हो गया अपना' वो तपाक से बोला और मुस्कुराता हुआ आगे बढ गया।
अचानक मदान के कहे अन्तिम वाक्य कान में गूंज उठे ‘सक्सेना ! ये काम तुम नहीं करोगे तो कोई और करेगा। मदान एक बार जो ठान लेता है वो कर के मानता है।'
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कहानीः बहाने से
कहानी : आत्म-समर्पण
जब कभी वो राऊण्ड पर निकलते तो मानो कॉरिडोर में कर्फ्यू लग जाता। एरिया मैनेजरों को एक साथ खडे हो कर गपियाते देख लेते तो उनकी नजर चश्मे के भीतर भी टेढी हो जाती। तब वो लोग बेचारे कई दिनों तक एक साथ नहीं दिखाई पड़ते थे। और भूले से अगर दिख भी जाते तो तुरन्त अपने काम धंधे में लग जाते। मदान साहब ऑफिस के हर आदमी के बारे में ‘खुफिया जानकारियॉं' लेते रहते थे और इस काम में उनकी चमचा टोली खूब बढ चढ कर अपनी ‘डयूटी' पूरा करती थी। कई दफा तो बात में नमक मिर्च लगा कर अच्छी जायकेदार बना कर मदान साहब के सामने सुनाई जाती और अन्य ‘सहगोत्री' चमचे हॉं में हॉं मिलाकर बात पर सच्चाई की मोहर लगा देते। कई सीधे-सादे लोग इस तरह आये दिन चमचा टोली के ‘अधिकारिक वक्तव्यों' की बली चढ जाते। मदान साहब सारे तमाशे को खूब एन्जॉय करते । उनकी इस विशिष्ट कार्यशैली के परिणाम भी आफिस में नजर आने लगे। किसी को आधा टारगेट अचीव करने पर ही भारी इन्क्रीमेण्ट मिलने लगा और किसी को टारगेट से ज्यादा अचीव करने पर भी कोरा ‘वेरी गुड'। नतीजतन ऑफिस में ‘खबरचियों' की नई खेंप तैयार होने लगी। जो जितना बडा ‘खबरची' वो बॉस का उतना बडा हितैसी और उतना ज्यादा प्रिय।कहने की आवश्यकता नहीं कि उसका उतना ही भारी इन्क्रीमेण्ट। लगाई -बुझाई से दूर रहने वाले भी अब इस ‘एकस्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटि' में गहरी दिलचस्पी लेते दिखाई देने लगे। ऑफिस का माहौल बडा बेढब हो चला था। कौन,कब,क्या कर बैठे ?कोई नहीं जानता था। आये दिन लोग पाळा बदलते दिखने लगे।
दिसम्बर का आखिरी पखवाडा चल रहा था। सब लोग साल की आखिरी रात को अपने अपने अंदाज से सेलिब्रैट करने वाले थे। आजकल सब लोग बस इसी प्लानिंग में लगे रहते थे। जरा फुरसत पाई नहीं कि लगे हवा में किले खडे करने। कोई पत्नी के साथ तो कोई गर्लफ्रैण्ड के साथ । कोई घर में तो कोई शराबघर में ।नये साल के स्वागत को हर कोई तत्पर जान पडता था। आज भी लंच के बाद लगे मजमे में इसी टॉपिक पर डिस्कशन चल रहा था। तभी चपरासी हाथ में एक टाईप किया हुआ कागज लेकर हॉल में अवतरित हुआ। उसकी निगाहें किसी को ढूंढ रही थी। प्रजापत को देखते ही वो मुस्कुरा दिया और आगे बढकर उसके हाथ में ‘वो कागज' देकर चलता बना। सब एकसाथ प्रजापत के पास जा पहुँचे ये देखने कि आखिर चपरासी क्या देकर गया है। किन्तु ये जानकर कि मदान साहब ने दिनेश प्रजापत का ‘एक्सप्लेनेशन' कॉल किया है तुरन्त ही सब तितर बितर हो गये। ‘न्यू ईयर सेलिब्रैसन' की चर्चाऍं एकाएक फुर्र हो गई। सब अपनी अपनी टेबिल पर जाकर काम में मुँह देकर बैठ गये।
दिनेश जैसे दब्बू किन्तु काम के प्रति सीरियस रहने वाला कैसे मदान की चपेट में आ गया ?जानकर मुझे बडी हैरानी हुई। उस पर अपनी कम्पनी का ‘डाटा' दूसरी प्रतिस्पर्धी कम्पनी के साथ शेयर करने का आरोप लगाया गया था। प्रजापत ने रो-रो कर बुरा हाल कर लिया था। जिससे और कुछ नहीं मगर ये जरूर जाहिर हो रहा था कि बन्दा बेकसूर है और किसी की कच्ची ‘खबर' पर उसको बलि का बकरा बनाया जा रहा है। मैंने उसको ढाढस बॅंधाया और " चिन्ता मत कर,कोई रास्ता निकाल लेंगे।" कहकर उसको सॉंत्वना दी। उस दिन शाम को दफ्तर से हम साथ ही निकले। मैं उन दिनों कुँवारा था और जवाहरनगर में एक मकान के गैराज पोर्शन में रहता था। मालिक मकान दुबई गया हुआ था कमाने और मालकिन अपने बच्चों के साथ अकेली यहॉं रहती थी,प्रवासी भारतीय की अप्रवासी पत्नी बेचारी। मेनगेट की एक अतिरिक्त चाबी मैंने बनवा रखी थी। सो खा-पीकर रात देर से लौटने में कोई असुविधा नहीं होती थी। तिस पर मकान मालकिन से भी थोडा ‘तारतम्य' था । सो किसी किस्म की तकलीफ नहीं थी मुझको वहॉं।उ स दिन प्रजापत को मैं अपने साथ ही ले गया। वो भी इस शहर में अकेला ही था। अकेला रहेगा तो ज्यादा सोच विचार करेगा,इसी विचार से मैंने उसको अपने साथ ले लिया था।
करीब घण्टे भर की समझाईश के बाद जाकर कहीं वो नॉर्मल हो पाया था। नौ बजे के लगभग हम डिनर करने के लिए निकले। मैं अक्सर राजापार्क में ही खाना खाता हूँ। नजदीक पडता है। सो पैदल ही निकल पडे। अभी ढाबे से काफी दूर थे कि अचानक प्रजापत बोल पडा " सक्सेना आज मूड ठीक नहीं है। एक-एक पैग हो जाए तो कैसा रहे?" अँधे को क्या चाहिए? दो ऑंखें। मैं झट तैयार "नेकी और पूछ पूछ।"
अब हम खाने की बजाय पीने की जुगाड में लग गए। एक रिक्शा किया गया और शाही अंदाज में उसको निर्देश दिया गया " रोशन बार चलो।"
एक-एक पैग से चल कर दौर तीन-तीन पैग तक जा पहुंचा। प्रजापत की ऑंखें चमकने लगी और वो आत्मसम्मान से लबरेज हो उठा " वो साला समझता क्या है अपने आप को? सक्सेना तुम अगर जरा सा सहारा लगा दो तो मैं साले की एसी-तैसी कर के रख दूँ।" मैं भी कुछ कम विद्रोही नहीं हुआ जा रहा था। फौरन बोला " उठो आज उसके घर चलते हैं। वहीं साले की मॉं-बहन एक करेंगे। अपना हुलिया नहीं पहचान पाएगा साला आईने में।"
" मगर सक्सेना अगर उसने हमसे बात करने से मना कर दिया तो ?" प्रजापत ने संदेह जताया।
" कैसे मना कर देगा?कोई मजाक है? डरता क्यूँ है साले? मैं हूँ ना साथ में।"
" वो और नाराज हो गया तो?" प्रजापत अब डरने लगा था। पल भर पहले शेर की तरह दहाडने वाला प्रजापत मेमने की तरह मिमियाने लगा था।
" तू साले हिजडा है क्या? तुझ जैसे कस्सी लोगों ने ही तो उसको खुला सांड बना दिया है। वरना क्या मजाल वो चूं भी कर जाए?जानता नहीं क्या कि हमारी खून-पसीने की कमाई पर ही वो एयरकंडिशनर की हवा खा रहा है। उसको साले को क्या पता कि फिल्ड में काम कैसे होता है?" मैं पूरी तरह तरंग में था और ‘करो या मरो' का बिगुल फूंकने की ठान चुका था।
"लेकिन उसने कुछ कह दिया तो?" वो अब भी सहम रहा था।
" तू डर मत यार। मेरे साथ चल बिंदास।"
" चल ठीक है। फिर जो कुछ बोलना है तू ही बोलना। मैं तो हॉं में हॉं भर दूँगा बस।" उसने तपाक से कहा और मैंने "हो" कहते हुए हामी भर दी।मदान का घर राजापार्क से ज्यादा दूर नहीं था। बार से बाहर आ कर हमने एक रिक्शा पकडा और थोडी ही देर बाद हम बापूनगर स्थित मदान साहब के घर के सामने थे। घर के बाहर एक कॉल बेल लगी थी। किन्तु बजाए उसको बजाने के, हम लगे दरवाजे को जोरों से पीटने और पीटते ही गए जब तक कि ‘भडाक' से दरवाजा खुल नहीं गया।दरवाजे पर मिसेज मदान थी ‘बोलिए।'
"मदान साहब से मिलना था।" मैं किंचित मुँह पर हाथ रख कर बोला। कहीं शराब की बदबू ना आ जाए।
" वो तो सो गए।" मिसेज मदान ने बडा सपाट-सा उत्तर दिया।
"ठीक है" मैं भी आग्याकारी बालक की तरह वापस पलट गया। मिसेज मदान दरवाजा बंद करने लगी । ना जाने मुझे क्या हुआ मैं वापस मुडा और किंचित ऊँची आवाज में बोला " जगा दिजिए। कहिए सक्सेना आया है।" मानो सक्सेना ना हुआ, कोई पीएम हो गया। मैं झौंक में था। पीछे मुड कर देखा प्रजापत दुबका जा रहा था सहमे हुए मेमने-सा। ऑंखों से उसको घुडकाया तो वो थोडा खिसक कर आगे हो गया। पर बोला कुछ नहीं। मिसेज मदान दरवाजा खुला छोड कर अन्दर बढ गई थी और मैं घुस कर हॉल में पडे सोफे पर जा कर पसर गया। ईशारे से प्रजापत को भी बुला लिया। वो भी पॉंव समेट कर पास ही एक कुर्सी पर बैठ गया। थोडी ही देर बाद मदान साहब प्रकट हुए। मंहगा नाईट सूट पहने वो बिल्कुल फ्रैश लग रहे थे और साफ लग रहा था कि वो चाहे जो भी कर रहे हों सो तो नहीं रहे थे। हॉं आने जाने वालों के लिए टालने का बहाना अच्छा है कि ‘साहब सो रहे हैं।'
‘कहो' उन्होंने बैठते हुए पूछा। साथ में बैठे प्रजापत को देखकर वो सारी रामकथा समझ गए। घूर कर उन्होंने प्रजापत को देखा भर, वो सहम गया। उसकी टॉंगें कांप रही थी और सारा नशा हिरण हो चुका था।
‘क्या काम था इतनी रात गए?' उन्होंने फिर पूछा।
‘कुछ खास नहीं। बस यूँ ही थोडा डिस्कशन करना था। सो चले आए और क्या?' मुझे कुछ और नहीं सूझा।
‘बोलो क्या डिस्कशन करना है?'
‘यही कि ऑफिस का माहौल ठीक नहीं है' मैंने बात शुरू की।
‘क्यों ?क्या हुआ ऑफिस के माहौल को?' मदान साहब बिल्कुल नॉर्मल थे।
‘होना क्या है? आप आजकल किसी की सही बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं। कुछ ‘स्वार्थी‘ लोगों ने आफिस को खेमेबाजी का अडडा बना रखा है। चुगलखोरों की बातों में आकर एसे निर्णय लिए जा रहे हैं, जिनसे शरीफ लोगों का जीना मुहाल हो गया है। इस प्रजापत का क्या कसूर था? जरा बताईये। मुझ में अचानक जाने कहॉं से शक्ति फूट पडी।
‘तुम नाहक ही इसकी तरफदारी कर रहे हो सक्सेना। मुझे ऑथेंटिक रिपोर्ट मिली है कि यह आदमी हमारे ‘डाटा-बेस' को दूसरी कम्पनी से शेयर कर रहा है।'
‘कौन है आपका ऑथेंटिक रिपोर्टर? वो गुप्ता जो एक एक चाय के लिए लोगों के गले पडता रहता है या वो अरोडा जो आपके पीछे से आपकी पत्नी के बारे में चटखाारे ले लेकर भददी-भददी बातें करता है। या वो सिंघल जिसकी लडकी आपके छोटू को पढाती है। किस ऑथेंटिक रिपोर्टर की बात कर रहे हैं आप?' मुझ पर ‘सुरा' पूरी तरह से हावी थी। मानो आरपार की लडाई के मूड में था।
‘मैं तुम्हें कोई एक्सप्लेनेशन देने की जरूरत नहीं समझता। किंतु मैं किसी भी केस को ऊपर रिकमण्ड करने से पहले खुद तसल्ली कर लेता हूँ ,तभी कोई एक्शन लेता हूँ। समझे?'
‘आप जानते हैं ,लोग आपकी कम्पनी में काम करना नहीं चाहते।'
‘कौन कहता है?'
‘कौन नहीं कहता ये पूछिए?' सुनकर मदान साहब सकपका गए।
‘आप जितनी तनख्वाह देते हैं ना ,उतने का तो अलाऊन्स उठा लेते हैं अन्य कम्पनियों वाले। चुगलखोरी के माहौल में कोई कैसे रह पाएगा तब?एसे में आपके यहॉं नौकरी करना घटी दरों पर बेगार करना नहीं तो और क्या हुआ? बताईये।' मैं घोडे पर सवार था फुल और आज ‘सम्पूर्ण स्वराज' की घोषणा करने पर आमादा था। प्रजापत जस का तस बुत बना बैठा था। मानो काठ मर गया हो।
‘तुम चाहते क्या हो? स्पष्ट बताओ।' मदान बोला। मदान साहब का ‘साहब' भी दारू की भेंट चढ़ गया।
‘प्रजापत के खिलाफ जो आरोप पत्र आपने निकाला है, उसको आप वापस लें बस।'
‘नहीं तो?'
‘नहीं तो मैं, नहीं हम दोनों नौकरी छोड देंगे। कल अपनी मेज पर हमारा रेजिगनेशन देख लेना। लात मारते हैं एसी नौकरी को जहॉं आत्मसम्मान चमचागिरी का मुखापेक्षी हो।' कहते हुए मैंने जेब से रजनीगंधा का जिपर-पाऊच निकाला और दो तीन चम्मच एक साथ फॉंक गया। मेरी बात सुनकर मदान लाल पीला नहीं हुआ जैसा वो अक्सर हो जाता है। वो शांत बना रहा और मेरी तरफ मुस्कुराकर देखते हुए बोला ‘तुम एक काबिल प्रोफेशनल हो सक्सेना। किसी बात की तह में जाए बगैर सिर्फ भावनाओं में बह कर फटे में पॉंव घुसा देना तुमको शोभा नहीं देता। तुम्हें असल बात मालूम नहीं है अभी।'
‘मालूम नहीं है तो आप बता दीजिए ना।' मैं पूरे जोश में था और आज प्रजापत को न्याय दिलाकर उठने की ठान कर आया था।
‘जोशी को तो तुम जानते ही हो। उसकी आजकल कम्पनी की पब्लिक रिलेशन ऑफिसर दीपाली बरूआ के साथ कुछ ज्यादा ही देखादेखी चल रही है। दोनों घण्टों ऑफिस में बतियाते हैं। प्रेमालाप में लीन रहते हैं।'
‘तो इसमें इस गरीब का क्या लेनादेना?' मैं बीच ही में बोल पडा।
‘सुनो तो।दफ्तर में उनका जी नहीं भरता तो वे लोग शहर में मिलते हैं। और शहर में मोज-मस्ती करने के लिए ये आपके मित्र महानुभाव उन्हें अपना आवास उपलब्ध कराते हैं। बदले में जोशी इनकी मिटिंग दूसरी कम्पनी के मैनेजर से कराता है। क्या है ये सब? बताओ।' मदान एकाएक ऊँची आवाज में बोलने लगा। सुनकर प्रजापत तो पत्ते की तरह कॉंपने लगा।लेकिन मैंने तुरन्त प्रतिवाद किया ‘किसी के घर आना-जाना कोई जुर्म तो नहीं है। आप भी अपने कलिग्स के घर आते-जाते होंगे। लोग भी आप के घर आते-जाते होंगे। इस मामले में आपकी दखलंदाजी बिल्कुल नाकाबिले बर्दाश्त होगी। तब किस तरह प्रजापत दोषी हुआ। बताऍं।रही बात उनके बीच चल रही देखादेखी की। सो उसमें ना आप कुछ कर सकते हैं ना मैं। जोशी और दीपाली बच्चे तो हैं नहीं कि उनको कुछ कहा जाए। वैसे भी प्यार करना कोई जुर्म तो है नहीं हमारे मुल्क में। उन्हें अपना निजी जीवन अपनी मरजी से जीने का पूरा हक है। हॉं,दूसरी कम्पनी वाली बात अवश्य ही विचारणीय है। किन्तु वो आपके लिए भी विचारणीय है। आप क्यों नहीं आत्म निरीक्षण करते कि क्या वजह है कि जो प्रजापत जैसा दब्बू आदमी भी ‘स्विच ओवर' करने कि सोच रहा है और दूसरी कम्पनी के मैनेजर से मीटिंग कर रहा है?' मैं आज पूरा प्रवचन झाडने के मूड में था।
‘अच्छा चलो तुम्हारी बात मान लेता हूँ। तो क्या तुम दोनों मेरी एक बात मानोगे।'मदान ने मुस्कुराते हुए पल्टी मारी।
‘क्या?' हम दोनों के मुँह से एक साथ बेसाख्ता निकला। इतनी देर में पहली बार प्रजापत के मुँह से बोल फूटा था।
‘मैनेजमेण्ट जोशी के काम से कुछ खास खुश नहीं है ,तुम तो जानते ही हो।काम में उसकी दिलचस्पी जरा भी नहीं है। इश्कमिजाजी जरा ज्यादा है। अगर तुम दोनों उसके खिलाफ एक बढिया सी कम्पलेण्ट लिख कर मुझे दे दो तो मैं तुम्हारा साथ दूँगा। बदले में प्रजापत का एकसप्लेनेशन वापस हो जाएगा और तुम्हारा इंक्रिमेण्ट। आफ्टर ऑल यू आर ए डिजर्विंग कैण्डडेट।' मदान ने आखिर अपने पत्ते मेरे सामने खोल ही दिए।
‘हम एसा गिरा हुआ काम नहीं कर सकते। क्यों करें ?जाति तौर पर हमको उनसे क्या तकलीफ है?कम से कम मुझको तो नहीं. और इस प्रजापत को भी क्या हो सकती है? क्यों बे?' मैं तैश खा गया। प्रजापत काठ के उल्लू की तरह जस का तस खडा था।
‘तब फिर यहॉं क्यों खडे हो?' मदान ने साफ शब्दों में हम पर अपनी मंशा जता दी थी। मतलब साफ था कि या तो उसका साथ दो नहीं तो भुगतो। सुनकर प्रजापत के तो माथे पर पसीना चमकने लगा। मैं एक झटके के साथ खडा हो गया और ‘मदान साहब नमस्ते। जिन्दा रहे तो मिलेंगे' कहकर चल पडा। प्रजापत मेरे पीछे पीछे।
दूसरे दिन, मैं अपने केबिन में बैठा अभी गई रात की घटना के बारे में ही सोच रहा था कि तभी पिऊन आया और ‘मदान साहब बुला रहे हैं।' कहकर चलता बना। सुनकर अपन तो कल की घटना को याद करके मारे आशंका के एक बार तो घबरा गए। लेकिन फिर सोचा देखा जाएगा । चलो।
मदान साहब ने मेरे आते ही चपरासी को बुला कर चाय का आर्डर दे दिया और साथ में कुछ बिस्कुट नमकीन ले आने की भी ताकीद की। चपरासी भी आज आश्चर्यचकित था। मदान के चेहरे की मुस्कुराहट को देखकर मुझे नहीं लगता था कि वो कल रात की बात को ‘डिस्कस' करना चाहता है। फिर मुझे क्यों बुलाया है सुबहा सुबह बग्रै किसी कारण के? मैं अजीब पशोपेश में था। आखिर मैंने ही पूछ डाला ‘जी सरा। कहिए।'
‘कहना क्या है भई? हमसे तो अकेले अब ये आफिस सम्हलता नहीं है। क्या क्या देखें हम? हम चाहते हैं कि तुम कुछ हमारी मदद करो। आफिस की कुछ रिस्पांसिबिलिटी तुम से शेयर करना चाहते हैं। आफ्टर ऑल यू आर ए डिजर्विंग कैण्डडेट एण्ड सीनियर पर्सन।' वो कुटिलता से मुस्कुरा रहा था।
‘आदेश करें सर।' मैं अतिरिक्त विनम्र था । ना जाने क्यों?
‘आदेश नहीं सक्सेना। तुम इतने सीनियर हो तुमसे तो मैं रिक्वेस्ट ही कर सकता हूँ।ऊपर वालों ने कुछ कम्पीटेण्ट आफिसर्स के नाम मॉंगे हैं मुझसे । जिन्हें असिस्टेण्ट मैनेजर के प्रमोशन के लिए कन्सिडर किया जा सके। सिनियेरिटी के हिसाब से तो दो तीन लोग हैं आफिस में। किन्तु मेरे जेहन में सिर्फ तुम्हारा ही नाम है। क्योंकि तुम ‘डिजर्विंग' तो हो ही ‘कम्पीटेण्ट' भी हो। लोग तुम्हारी बात मानते हैं और स्टाफ तुम्हारी ईज्ज्त करता है। तुम्हारे एक ईशारे पर काम होता है ,ये मैं जानता हूँ। आफिस भर में तुमसा कोई ओर नजर नहीं आता मुझको।' उसने बडी कुटिलता से मुस्कुराते हुए बुलाने का म्तांव्य साफ किया। चाय बिस्कुट आ चुके थे।
‘जी मुझे क्या करना होगा?'मैंने चाय की घूँट भरते हुए पूछा।
‘करना कुछ नहीं है। इस सारी प्रक्रिया में एक अडचन आ रही है, बस।'
‘क्या?'
‘जोशी। वो भी इस प्रमोशन का दावेदार है। उसका अनुभव तुमसे दो साल ज्यादा है।जिस कारण टॉप मैनेजमेण्ट जोशी के लिए ज्यादा ‘कीन' है। पर मैं जानता हूँ कि वो कितना निकम्मा है। सिर्फ सर्विस पीरियड बढ जाने से कोई ज्यादा काबिल थोडे ही हो जाता है। तिस पर मैं ये भी जानता हूँ कि प्रमोशन की तुमको ज्यादा जरूरत है। तुम्हें अपनी बहन की शादी करनी है तुम्हारा छोटा भाई मथुरा में इंजिनियरिंग की पढाई कर रहा है गॉंव में तुम्हारे बूढ़े मॉं बाप भी हैं। और फिर तुमको अपने बारे में भी तो सोचना है ,शादी ब्याह करना है कि नहीं ? या जिन्दगी भर ‘अप्रवासी मकान मालकिन' का किरायेदार बने रहना है? बोलो। इसलिए मैं पर्सनली तुम्हें प्रमोट कराना चाहता हूँ। यू नो मेरी रिकमण्डेशन पर ही सब डिपेण्ड करेगा।' मदान अपने असली चोले में आता जा रहा था। उसकी मुस्कुराहट से कमीनगी साफ झलक रही थी।
‘लेकिन¼' मैं रात की बात को अभी भूला नहीं था।
‘लेकिन वेकिन क्या? मुझे पता है तुम दिल के बहुत साफ हो। कल रात भी तुमने जो कुछ किया वो प्रजापत की मदद करने के लिहाज से ही किया था। इसलिए मैंने उस सब का कुछ बुरा नहीं माना। वरना किसी की क्या मजाल कि मदान के सामने इतने ऊँचे सुर में बोल जाए? नौकरी से हाथ धोना पड़ जाए सो अलग। चक्की और पिसवा दूँ,दो मिनट में।' मुस्कुराते हुए उसने मेरे सम्मुख अपनी सामर्थ्य का और मेरी विवशता का एक ही झटके में खुलासा कर दिया था। वाकई वो बडा घाघ था, आज मैं साफ देख रहा था। मैं चुप ही रहा। कुछ बोला नहीं।
‘जी मुझे क्या करना होगा?' मैंने कुछ देर बाद पुन: दोहराया।
‘कुछ नहीं। बस जोशी के खिलाफ एक बढिया-सी कम्पलेण्ट तैयार कर के उस पर दस-बीस लोगों के साईन करवा दो। बाकी सब मैं देख लूँगा। क्या है कि सब लोगों पर तुम्हारा बडा दबदबा है। लोग तुम्हें मना नहीं करेंगे। मैं उसी कागज पर अपना कमेण्ट लिखकर हैड ऑफिस भेज दूँगा। उसके बाद तुम्हारे प्रमोशन में कोई रोडा नहीं रहेगा।' उसने मेरी तरफ ऑंख मिचकाते हुए कुटिलता से फुसफुसाया।
‘सर,एक तरफ आप मुझे ‘डिजर्विंग' और ‘कम्पीटेण्ट' कहते हैं और दूसरी तरफ मुझसे ऐसा कार्य करने को कहते हैं। मैंने कल रात ही आपको मना कर दिया था कि मुझसे ऐसा नहीं हो सकेगा। जोशी जी ने मेरा क्या बिगाडा है? बल्कि जब मैं इस शहर में नया नया आया था तब उन्होंने मेरी मदद ही की थी। उस मदद का बदला मैं इस तरह दूँगा। ऐसा आपको क्यों लगता है? मैं ऐसा कतई नहीं कर पाऊँगा।'मैंने किंचित रोष के साथ कहा।
‘देखो मदद-वदद तो कोई भी कर सकता है,प्रमोशन कोई भी थोडे ही दिला सकता है। और फिर तुम ये क्यों भूलते हो कि हम खुद तुमको इस काम के लिए कह रहे है। मदान खुद। सोचो जरा।' उसने कुटिलता से फिर ऑंख दबा दी।
‘सॉरी सर। आपने गलत आदमी को चुना है, बस। मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता। चलता हूँ।' मैं कहता हुआ उठने लगा।
‘सक्सेना ! ये काम तुम नहीं करोगे तो कोई और करेगा। मदान एक बार जो ठान लेता है वो कर के मानता है।' वो बुरी तरह तिलमिला उठा। क्रोध के मारे उसका चेहरा तमतमा गया। मैं बगैर कुछ बोले केबिन से बाहर निकल गया।
आ के सीट पर बैठा ही था कि प्रजापत पास आ बैठा ‘क्या कह रहा था ?'
‘कुछ नहीं । वही ,जोशी का रोना रो रहा था।' मैंने छोटा-सा जवाब दिया। इतने में ही पिऊन फिर से मेरी टेबिल के सामने आ खडा हुआ। ‘क्या है?' मैंने जोर से पूछा।
‘परजापत जी, साब बुला रहे हैं।' उसने जरा हिकारत से बिना मेरी ओर देखे प्रजापत से कहा। प्रजापत सिर पर पैर रख कर भागा। मूड ऑफ था। सो मैं उस दिन हॉफ-डे लेकर घर चला आया।
प्रजापत आजकल खुश रहने लगा था। उसने मदान से माफी मॉंग ली थी और भविष्य में अनुशासन में रहने का भरोसा भी दिलाया था। उसका ‘एक्सप्लेनेशन' भी कैंसिल हो गया था। मदान की मण्डली में भी वो अक्सर बैठा दिखाई देने लगा था। प्रजापत को खुश देखकर मैं भी मन ही मन खुश था कि चलो एक शरीफ आदमी ‘झमेले' में पडने से बच गया।
फिर एक दिन आफिस में घुसते ही प्रजापत ने मिठाई का डब्बा सामने कर दिया। मैंने प्रश्निल भाव से पूछा ‘किस खुशी में? '
वो तपाक से बोला ‘हैप्पी न्यू ईयर।'
‘सेम टू यू।' अचानक मुझे याद आया कि आज तो नया साल है।
‘एक पीस और ले सक्सेना।' प्रजापत ने पुन: डब्बा मेरी और बढाते हुए कहा।
‘बस यार।'
‘ले तो सही।' इस बार उसकी आवाज में मनुहार थी।
‘आखिर बात क्या है? बडा खुश दिखाई दे रहा है आज।' मैंने दूसरा पीस उठाते हुए पूछा।
‘प्रमोशन हो गया अपना' वो तपाक से बोला और मुस्कुराता हुआ आगे बढ गया।
अचानक मदान के कहे अन्तिम वाक्य कान में गूंज उठे ‘सक्सेना ! ये काम तुम नहीं करोगे तो कोई और करेगा। मदान एक बार जो ठान लेता है वो कर के मानता है।'
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कहानीः बहाने से
कहानी : आत्म-समर्पण
Monday, January 08, 2007
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1.आत्म समर्पण www.hindinest.com/kahani/2003/NS9.htm-28K
2.हॆप्पी न्यू ईयरwww.hindinest.com/kahani/2003/NS30.htm-119K
3.इम्तिहानwww.hindinest.com/kahani/2003/144.htm-22K
1.आत्म समर्पण www.hindinest.com/kahani/2003/NS9.htm-28K
2.हॆप्पी न्यू ईयरwww.hindinest.com/kahani/2003/NS30.htm-119K
3.इम्तिहानwww.hindinest.com/kahani/2003/144.htm-22K
अभिव्यक्ति(http://www.abhivyakti-hindi.org/) पर-
1.थपेडा www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2005/thapeda/thapeda1.htm
2.बस कब चलेगीwww.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2005/buskubchalegi/bkc1.htm
3.बहाने से www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2005/bahane_se/bahane_se1.htm
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Monday, December 11, 2006
इस माह की कहानी
' कब तक आखिर'
-संजय विद्रोही
-संजय विद्रोही
नवाब लेन ... चलोगे?' एक रिक्शेवाले से पूछा।
'चलेंगे बाबू ... बैठो' कहकर रिक्शेवाले ने अपने मैले-कुचैले गमछे से रिक्शे की सीट पौंछी और जोर से सीट पर हाथ मार कर बैठने का ईशारा किया। मैं एक हाथ से अपनी धोती सम्हालते हुए सावधानी से रिक्शे में बैठ गया।
रिक्शेवाले ने उसी गमछे से माथे का पसीना पौंछा और जुट गया अपने काम में। आदमी ढोने का काम। मेरे दाँये हाथ की अंगुलियों ने कँधे पर लटके थैले में रखे डब्बे को कस कर पकड़ रखा था।
मैं अजीब कौतूहल से सड़क के दोनों ओर गर्दन घुमा-घुमा कर देख रहा था। हालाँकि यह कलकत्ता मेरा बखूबी देखा भाला था। किन्तु हर बार इस शहर में एक नयापन लगता है। हर बार पहले से अधिक जीवन्त, अधिक तेज रफ्तार प्रतीत होता है।
रिक्शा मुख्य सड़क से उतर कर अब एक संकरे रास्ते पर चला जा रहा था। रास्ते में एक ओर कुछ औरतें टोकरों में मछलियाँ लिए बैठी थी। ग्राहक मछलियों के मोल भाव कर रहे थे। कुछ ग्राहक सिर्फ मछली वाली के ऑंचल में झाँक लेने की गरज से झुक कर नाहक ही मछलियों को उलट-पलट कर देख रहे थे। गंदुमी त्वचा, किन्तु गठीले बदन वाली एक पाट की धोती कमर में बैठी वो औरतें अपनी उघड़ी हुई पिंडलियों पर चिपकी, ग्राहकों की बेधती नजरों से बेखबर मछली तोलने और पैसे लेने में व्यस्त थी और ग्राहक अपने 'काम' में। मैं ये सब देखकर मुस्कुरा दिया। इतने में रिक्शा उस छोटे से मछली बाजार को पीछे छोड़कर आगे निकल चुका था।
अब मार्ग में अधिक चहल-पहल नहीं थी। रिक्शा तेज रफ्तार से चल रहा था। मैंने अब भी थैले में रखे डिब्बे को कसकर पकड़ा हुआ था। अचानक मैंने गौर किया कि ये तो वह रास्ता नहीं है जो हवेली को जाता है। 'अरे भाई इधर कहाँ लिए जा रहे हो? नवाब लेन का ये कौन सा रास्ता है? बताओ तो।' मन के विचार मुँह से निकल पड़े। 'बाबू, मेन रास्ते पर सड़क मरम्मत हो रही है सो हम आपको इधर से ले आये हैं। रास्ता लम्बा जरूर है लेकिन पहुँचेगा नवाब लेन ही। आप चिन्ता ना करें। आप हमें किराया उसी छोटे रास्ते का दे दीजिएगा।' हाँफते हुए पैड़ल मारता रिक्शाचालक बोला। हालाँकि उसके जवाब से आंशिक संतुष्टि तो हो गई थी, फिर भी एक धड़का-सा था हृदय में। 'किसी की अमानत, वो भी बेटी के ब्याह का गहना लेकर जा रहा हूँ मैं, कुछ ऊँच-नीच हो जाये तो सेठ जी की इज्जत का क्या होगा? क्या जाने रिक्शा वाले की नियत कैसी हो? मन किसने देखा है? सोच रहा था कि अपनी तसल्ली के लिए पास से गुजर रहे एक आदमी से पूछा 'सुनिए साहब, क्या नवाब लेन को यही रास्ता जायेगा।' 'जी हाँ' कहकर वह आगे बढ़ गया। रिक्शेवाले ने पलट कर देखा और अर्थपूर्वक मुस्कुरा दिया, शायद वह मेरी मनोदशा भाँप गया था। मैं स्वयं में बहुत शर्मिन्दा हुआ और सिर घुमाकर सड़क के एक ओर देखने लगा।
पिछली बार जब जमीन के कागजों पर सेठ जी के दस्तखत लेने कलकत्ता आया था तब उनके यहाँ दो व्यक्ति बैठे थे। एक तो बूढ़ा था। जिसके चेहरे पर गजब की चमक थी। सफेद धोती कमीज शरीर पर, सिर पर काली महाजनी टोपी, पाँव में चमड़े के जूते और हाथ में बेंत लिए वह, सेठजी से कोई गम्भीर चर्चा कर रहा था। बगल में एक सुदर्शन युवक बैठा था। काली पतलून सफेद कमीज, करीने से कंॅघी किये गये बाल और सीधा सादा खानदानी प्रतीत होने वाला युवक जो जमाने की हवा से अभी तक अनछुआ था। गर्दन झुकाए बेवजह अपनी अंगुलियों' की अकड़न निकाल रहा था। बीच-बीच में नजर उठाकर सामने के बरामदे में खुलने वाले कमरे के दरवाजे की ओर भी देख लेता था और तुरन्त संकोच से दृष्टि झुका लेता था। वहाँ सत्या काँधे पर ऑंचल डाले इस तरह छुप कर खड़ी बातें सुन रही थी मानो उसे कोई ना देख रहा हो। लेकिन वह युवक उसे देख रहा है, वो नहीं जानती थी। 'तो फिर तय रहा कांतिलाल जी, हमें यह सम्बन्ध मँजूर है। अब आप उस बात का ध्यान रखना। वैसे आप खुद भी खानदानी हैं, समझदार हैं।' वृध्द ने उठते हुए कहा। उधर सत्या और युवक की ऑंखें मिली तो सत्या शरमाकर ऊपर दौड़ गई। सेठजी और वह युवक भी खड़े हो गये। सेठजी ने वृध्द का हाथ अपने हाथों में लेते हुए विनम्र लहजे में कहा 'घोषाल बाबू, वैसे तो लड़की वाले कभी भी वरपक्ष की बराबरी नहीं कर सकते ... सम्भव भी नहीं है, किन्तु आपकी इज्जत का पूरा ख्याल रखने का प्रयास करूँगा।'
'अरे सेठ जी कैसी बातें करते हैं आप? सेठ कान्तिलाल के मुँह से ऐसी बातें शोभा नहीं देती। आपको रुपये पैसे की क्या कमी? आप तो कई शादियाँ एक साथ कर दें और साँस तक ना निकालें।' हँसकर घोषाल बाबू ने कहा।
'ये तो आपका बड़प्पन है। वरना, अब वो पहले वाली बात कहाँ रही है, घोषाल बाबू? हाँ, जमींदारी के वहम से पुरानी शानोशौकत जिन्दा है, बस।' एक लम्बी साँस निकल पड़ी सेठ जी के मुँह से।
'अरे जाने दीजिए साहब ... बेटा अजीत ... सेठ जी के पाँव छुओ ये तुम्हारे होने वाले ससुर हैं।' घोषाल बाबू ने बेटे के कंॅधे पर हाथ रखते हुए कहा। बेटे ने बढ़कर चरण छुए और सेठजी ने आशीर्वाद में अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रख दिये।
उनको बाहर तक विदाकर के लौटे तो निढाल होकर सोफे पर गिर पड़े। मैं पास ही बैठा उन कागजों को छाँटकर अलग कर रहा था जिन पर सेठजी के दस्तखत लेने थे। उनको इस तरह निढाल होकर गिरते देखा तो उठ कर दौड़ पड़ा।
'क्या बात है मालिक, क्या हुआ?
''कुछ नहीं अखिलेश बाबू ... यूँ ही। ... सत्या का ब्याह करना है। ... खरीदना है लड़का ... ' कहते हुए सम्हल कर सेठ जी बैठे। मैंने बढ़कर उनकी कमर के नीचे तकिया लगा दिया।'आप चिन्ता क्यों करते हैं सेठ जी ... भगवान ने चाहा तो सत्या बेटी राजी-खुशी परायी हो जायेगी ... फिर जमींदारी तो है ... ब्याह की चिन्ता आप क्यों करते हैं?'
'अखिलेश बाबू ... आप तो असलियत जानते हैं ... फिर क्यों सब लोगों जैसी बातें करते हैं? आप जानते हैं कि उस जमींदारी के भरोसे रहा तो हो चुकी सत्या अपने घरबार की। कुछ एकड़ बंजर जमीन को आप जमींदारी कहते हैं?' सेठजी का लहजा दीन और परेशान था।
'आपने कितने ही लोगों पर अहसान कर रखे हैं। कितनों ही की लड़कियों के ब्याह में दान-दहेज दे चुके हैं। कितनों ही के लगान माफ कर चुके हैं। क्या वो सभी इस आड़े वक्त हमारे काम नहीं आयेंगें? आप तो नाहक ही चिन्तित होते हैं। हौसला रखें भगवान भला ही करेंगें।' कहकर मैं वापस मुड़कर जाने को हुआ कि लौटकर धीमे से पूछा, 'कुछ कागजों पर दस्तखत करने थे, अभी ... या बाद में?'ए 'लाओ अभी क्या और बाद क्या? अब तो सिर्फ दस्तखत करने तक ही की जमींदारी बाकी रह गई है।' मैंने चुपचाप लाकर कागज उनके सामने की मेज पर रख दिये और उन्होंने चुपचाप सभी पर अपने हस्ताक्षर कर दिये। मैं कागज समेट कर कमरे से बाहर चला गया।'सच तो है, अब कैसी जमीन और कैसी जमींदारी? बंजर जमीन और भूखे काश्तकार क्या दे पाते हैं? जिसके भरोसे बेटी ब्याहने का हौसला किया जा सके। और 'अच्छे' लड़के आजकल सस्ते कहाँ? बिना माँ की बच्ची को पालने में वैसे ही आदमी पूरा हो जाता है, उस पर उसके ब्याह की चिन्ता। सयानी बेटी को ज्यादा दिन घर बिठाया भी तो नहीं जा सकता। फरिश्ता समान आदमी हैं, सेठजी। कभी काश्तकारों, जुलाहों पर सख्ती नहीं की। जब तक पास में रुपया रहा, जरूरतमँदों को हाथ भर-भर के देते रहे और आज वही दाता खुद इस सलीके में है कि बेटी को कैसे डोली चढ़ाये? उस पर झूठी शानोशौकत के रहते सामने वालों की ना बुझने वाली भूख-प्यास, सो अलग। भगवान जो भी करे लेकिन सत्या को सही सलामत इज्जत सहित ब्याही जाने दे।' सोचता हुआ मैं अपने कमरे में आ पहुँचा। चश्मा उतारकर एक ओर रखा और धोती के छोर से पसीना पौंछते हुए चारपाई पर लेट गया। कुछ ही देर हुई थी कि सत्या कमरे में आई 'दादा ... बाऊजी बुला रहे हैं।'ए 'चलो मैं आता हूँ' मैंने उठते हुए कहा और चश्मा लेने को मेज की ओर गया। लेकिन वो अभी तक खड़ी थी। 'चलो सत्या ... क्या है, कुछ कहना है?' सुनते ही सत्या मुझसे लिपट गई और रोने लगी। 'अरे पगली रोती क्यों है? ब्याह करवाकर पराये घर तो एक दिन सभी को जाना होता है? इसमें रोने की क्या बात है? और मैं जो हूँ, बाऊजी की चिन्ता ना कर ... तू तो अपना घर बसा।' मैंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। 'दादा ... मैं ये शादी नहीं करूँगी ... ' 'क्या कहती हो सत्या ... क्यों नहीं करोगी ये शादी ... कोई और है, जिससे तुम? ... ' 'नहीं दादा ... ऐसी बात नहीं है ... लेकिन ... मैं अपनी शादी के लिए बाऊजी की इज्जत नीलाम होते नहीं देख सकती। इससे तो अच्छा होता, मैं मर जाती। कम से कम बाप की इज्जत खाक में मिलने का कारण तो ना बनती।' वो सुबकने लगी थी। 'पागल हुई है क्या ... किसने ऑंख उठायी बाऊजी की इज्जत पर? बताओ। और गृहस्थ में तेजी-मंदी तो चलती रहती है। इसके लिए तुझे रो-रोकर हलकान करने की क्या पड़ी है? पागल कहीं की' सत्या को हिचकियाँ आने लगी थी। हिचकियों के बीच जब उसने कहा, 'हवेली गिरवीं' तो सुनकर मुझे धक्का-सा लगा। 'चलो ... तुम भीतर जाओ मैं देखता हूँ। कुछ बेजा हरकत की तो मुझसे बुरा मत जानना। बाऊजी को दुख होगा।' कहता हुआ मैं तेज कदमों से बैठक की ओर बढ़ा। सत्या ऑंसू पोंछती हुई भीतर चली गई।
बैठक में सेठजी के पास दो महाजन बैठे थे। मैं चुपचाप जाकर सेठजी के पास खड़ा हो गया। सेठजी ने कलम मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा 'अखिलेश बाबू ... गवाह की जगह दस्तखत कर दीजिए' मैंने सवालिया दृष्टि उनकी ओर घुमायी तो उन्होंने धीरे से मेरा हाथ छू लिया और हौले से पहलें झुकाकर उठाली। उन ऑंखों में मजबूरी तैर रही थी। मैंने चुपचाप कागज पर हस्ताक्षर कर दिये। महाजन एक छोटी सी संदूकची वहीं छोड़कर उठ गये। मैं उन्हें बाहर तक छोड़ने गया और लौटते हुए वहीं से अपने कमरे की ओर मुड़ने लगा कि सेठजी ने आवाज दी, 'अखिलेश ... यहाँ आओ।' मैं चुपचाप उनके पास आ गया,
'हाँ' 'नाराज हो हवेली के सौदे से? ... लेकिन और कोई रास्ता नजर नहीं आया।''हम कहीं ओर से इन्तजाम कर सकते थे ण्ण् हवेली गिरवी रखने की क्या जरूरत थी?' मैंने तनिक ऊँचे स्वर में, किन्तु अपनापे के साथ कहा। 'देखो बेटा ... जो आदमी उम्र भर दोनों हाथों से देता ही रहा हो ना, उसका हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता और यकीनन फैला हुआ वो हाथ खाली ही लौटता है। क्योंकि कुछ लोग तो नजर चुरा लेते हैं और कुछ ये सोचते हैं कि इतना बड़ा रईस ... माँग रहा है? अजी जाने दीजिए मजाक की होगी। इज्जत पर परदा पड़ा रहे ... बेटी ब्याही जाये ... तो हवेली क्या चीज है ... ?' कहते हुए उनकी ऑंखों से दो ऑंसू टप्प से टपक पड़े। मेरी भी ऑंखें नम हो आयी।
संदूकची खोलकर दो तीन रुपयों के बंडल दोनों हाथों से मुझे थमाते हुए बोले, 'अखिलेश ... बेटा तुम मेरे मातहत ही नहीं हो ... सत्या के बड़े भाई भी हो। सारा इंतजाम तुम्हें ही देखना है। जो मुनासिब समझो खानदान की इज्जत को देखते हुए, सत्या के लिए गहने खरीद लाओ ... और ये बाकी के रुपये भी अपने पास रखो ... सभी कुछ तुम्हें ही करना है ... वैसे भी बाप ना रहे तो बेटा ही बहन को डोली में विदा करता है ... मुझे हुआ ना हुआ ... बराबर ही मानो।' आवाज में असीम निराशा और दुरूख था। मैं घुटनों के बल गिर पड़ा। मुझ अनाथ को आज पहली बार इतना स्नेह एक साथ मिला था कि ऑंखों में समा नहीं पा रहा था। कदमों में सिर टिका कर रो पड़ा 'बाऊजी ... बाऊजी' और सेठजी ने मेरे सिर पर अपना हाथ रख दिया।
'बाबू ... बाबू आपका ठिकाना आ गया।' जैसे किसी ने सोते से जगा दिया हो। मैं रिक्शे से उतरा और किराया चुकाकर घर की ओर बढ़ा 'क्या बात है ...? कल शादी है ... ना कोई रंगरोगन ... ना रोशनी ... ना साज सजावट ... ना चहल पहल ... कुछ अनहोनी ना हो गई हो मेरे पीछे? ... सत्या ना कुछ कर बैठी हो ... सेठजी को ना कुछ हो गया हो? ... ' अनिष्ट की आशंका ने कदमों की रफ्तार तेज कर दी थी। भीतर गया तो बैठक में जमीन पर सत्या गुमसुम सी घुटनों पर सिर टिकाये बैठी थी। पास ही जरूरत का कुछ सामान एक पोटली में बँधा रखा था। मेरा दिल धक्क से करके रह गया। कदमों की आहट सुनकर सत्या ने नजर उठाकर देखा। सामने मुझे पाकर दौड पड़ी और लिपट कर बिलख-बिलखकर रोने लगी। मेरे हाथों से जेवरों वाला थैला छूटकर जमीन पर गिर पड़ा। सारे शरीर को जैसे काठ मार गया था। ना कुछ कहते बनता था और ना ही सत्या को चुपकर पाने की कोशिश कर रहा था। कुछ देर बाद सत्या के ऑंसू मेरी कमीज पर गिरे और एक अनाथ बेटी के असीम दुख की तपत मेरे सीने से छुयी तो मुझे मेरे होने का अहसास हुआ। मैं चौंक कर नींद से उठा, मानो।
'सत्या ... कब हुआ ये सब?' धीमे से पूछा मैंने।'आप गये, उसके दूसरे दिन ... वो दरिन्दे फिर आये थे। कहने लगे इतने दान-दहेज से क्या होगा ... रकम थोड़ी और बढ़ाइये ... बाऊजी की उनसे काफी जिद्द-बहस हुई ... अन्त में वो रिश्ता तोड़ कर चले गये ... बाऊजी की तो जैसे जीवन डोर ही तोड गये वो नीच ण्ण् सारा दिन बाऊजी बैचेन रहे, और ... उसी रात उनके दिल की धड़कन बन्द हो गयी।' सत्या फूट-फूटकर रो रही थी। मेरी ऑंखें भी बहने लगी थी। 'दादा ... कल वो महाजन भी आये थे ... कहने लगे दो चार दिन में हवेली खाली कर देना ... अब हवेली के तिनके-तिनके पर हमारा अख्तियार है ... मैं कहाँ जाऊंगी दादा? ... मैं भी क्यों ना मर गई? ... ये सारी मुसीबत मेरे कारण ही तो है ... ' हिचकियाँ बँध गई थी सत्या की।
'कहाँ जाऊँगी, मतलब? क्या तेरे दादा का घर तेरा नहीं है ... क्या बाऊजी मुझे अपना बेटा नहीं मानते थे? अब जो हो गया सो भूल जा ... सामान उठा ... हम आज ही इस जलील शहर को छोड़ जायेंगें, जहाँ बेटों के मोल तय करते-करते लोग बेटियों को अनाथ कर देते हों। जहाँ बूढ़े लाचार बाप को अपनी इज्जत तक दहेज में दे देने को मजबूर कर दिया जाता हो। जहाँ रुपये के लिए किसी कुँआरी के अरमानों का कत्ल कर दिया जाता हो। ऐसी कत्लगाह में हम और नहीं रहेंगें। ... बिल्कुल नहीं रहेंगें ... आज ही चले जायेंगें ... अभी और इसी वक्त।'
सत्या मेरे सीने से मुँह सटाये थी। उसकी बगल में एक छोटी-सी गठरी थी। ऑंसू अब भी बह रहे थे। कदमों में मौत की सी उदासी थी। हम दोनों धीरे-धीरे बाहर की ओर जा रहे थे। मुडकर एक बार हवेली, बैठक, वो सोफा जिस पर अन्तिम बार सेठ जी को बैठे देखा था, सब कुछ देखा और सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ गये। मेरा एक हाथ सत्या के सिर को अपनी सीने पर सम्हाले सहला रहा था। उसकी हिचकियाँ धीरे-धीरे धीमी हो गयी थी। पर उसके अन्दर का दर्द तीव्र होता जा रहा था, ऑंखों के डोरे सुर्ख हो चले थे और गालों पर ऑंसुओं की सूखी लकीरों से दहेज की दरिन्दगी टपक रही थी, बेहिसाब, लगातार।(समाप्त)
Friday, August 04, 2006
अगस्त की कहानी: " झूठ के सहारे"
" झूठ के सहारे"
-संजय विद्रोही
जब कोई पास नहीं होता तो जाम पास होता है। दिसम्बर की सर्द शामें यूँ भी अकेलापन कहाँ बर्दाश्त कर पाती हैं? बस ग्लास मेज पर सजाकर बैठा ही था कि डोरबेल जोर से घन्ना उठी। उठकर दरवाजा खोला, सामने सक्सेना खड़ा था। देखते ही देखते गले लग गये हम। मैंने हाथ पकड़कर मेज की ओर खेंच लिया 'सक्सेना बड़े सही समय पर आए हो, यार।'
'नहीं। मैं नहीं लूँगा, चौहान।'
'क्यों भाई? काफिर कब से रोजे रखने लगे?' मैं जोर से ठहाका मार कर हँसा। सारा कमरा हिल गया। ठहाका उछल कर जोर से सिर पर आ गिरा। धप्प्। मैं झूम उठा।
'अभी, परसों हैंग ऑवर हो गया था यार। उसी का खुमार अभी तक नहीं उतरा।'
'ऐसा कौन हमप्याला मिल गया मेरे सौदाई को, जिसने हैंग कर डाला?' मैंने पीटर स्कॉच की नई बोतल की सील तोड़ते हुए पूछा।
'नशा शराब का नहीं था दोस्त, सोहबत का था।' वो जरा शरारत से मुस्कुरा दिया। मैंने एक ग्लास उसकी ओर बढाया और 'चियर्स' के साथ दोनों ने धीरे से एक सिप ली।
'किसकी सोहबत फरमा रहे थे जनाब?' मैंने सिगरेट सुलगाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।'बस पूछ मत, चौहान। महीने के आखिरी शनिवार को तो बस ... ' वो किसी स्वप्नलोक में खोने लगा।
'कहाँ जा रहा है? धरती पर ही रह।' मैंने चुटकी बजाते हुए कहा।
'जन्नत को याद कर रहा था ।'
'क्या बात करता है?'
'तुमको पता है मैंने एक क्लब ज्वॉईन कर रखा है?' उसने बात शुरू की।
'तुम रईसों के पास और काम भी क्या है? रुपया कमाते हो तो उसे ठिकाने तो लगाओगे ही, कहीं ना कहीं।'
'मेरे भाई, उस क्लब में बिजनेसमैन ही नहीं हैं, फौजी अफसर भी हैं। एडवोकेट भी हैं। लेखक भी हैं। यहाँ तक कि प्रोफेसर्स भी हैं।'
'सभी हैं तो पैसे वाले ना?'
'तुम तो एक जगह अटक जाते हो। अच्छा चलो सब पैसे वाले हैं। अब बात तो सुनो' उसने जरा रुक कर एक घूँट खेंचा।
'हाँ, अब बता' मैंने भी गिलास खाली करके सिगरेट थाम लिया और धुँआ उड़ाने लगा। कमरे में धुँए के बादल मँडराने लगे।
'हमारे क्लब की हर महीने के आखिरी शनिवार को एक पार्टी होती है। जहाँ यार लोग अपनी-अपनी बीवियों को लेकर आते हैं और दूसरों की बीवियों को देख-देख कर लार टपकाते रहते हैं। बिवियाँ भी दूसरे मर्दों की निगाहों को हँस-हँस कर पीती हैं, नजरों ही नजरों में। कोई जानबूझकर अपने लो-कट ब्लाऊज पर से साड़ी ढलकाती है, तो कोई बात-बेबात नीचे झुक-झुककर कभी कुछ उठाती है, कभी साड़ी की सलवटें ठीक करती है। कोई इतने टाइट कपड़े पहन कर आती है कि बस कुछ भी देखने के लिए कोशिश ही नहीं करनी पड़ती ... सब कुछ अपने आप ही बाहर झाँकता रहता है।'
'ऐसा क्या?' मेरी ऑंखें फैलने लगी।'... ये तो कुछ नहीं दोस्त। पिछले दिनों से क्लब में हमने एक नया खेल शुरू किया है। बीवियों की अदला-बदली ... '
'अदला-बदली? किसलिए? डाँस-वाँस के लिए?' मैंने सहजता से पूछा।
'सबकुछ के लिए। शनिवार की पूरी रात के लिए' सक्सेना ने ऑंख मारते हुए कहा।
'क्या?' सुनकर मेरी जान हलक में आ गई।'नहीं यार। ऐसा कभी होता है?' थूक गटकते हुए मैंने पूछा। मैं अब भी मानने को तैयार नहीं था। मेरे आश्चर्य का ठौर नहीं था।
'होता है? भाई मैंने कई बार खेला है ये खेल।' सक्सेना तरंग में था।
'क्या?'
'हाँ।'
'फिर?' मैंने जल्दी से पैग खत्म किया। उसने भी। नए पैग तैयार कर के हम फिर डट गए।
'शनिवार की रात खूब दारु-शारु, डाँस-वाँस, हो-हल्ला होता है। आखिर में सभी मर्द अपनी-अपनी गाडियों की चाबियाँ एक बड़े बीयर से भरे जग में डाल देते हैं और फिर एक-एक की पत्नी को एक-एक चाबी निकालने को कहा जाता है। जिसके हाथ जिस मर्द की चाबी आ गई, वो रात भर उसके साथ रहेगी ... ' सक्सेना ने चटखारे लेते हुए खेल का महात्म्य समझाया।
'फिर?' मैं हक्का-बक्का था।
'फिर क्या? वही जो रात में मर्द औरत के बीच होता है ... ' वो ऑंखों को गोल-गोल घुमाने लगा।'क्या भाभी भी जाती है तेरे साथ यह खेल खेलने?' सशंकित-सा मैं असमंजस में था।
'क्यों नहीं?' वो तपाक से बोला।
'उनको कोई आपत्ति नहीं होती?'
'क्यों भला? उसका भी तो भई स्वाद बदल जाता है कि नहीं? घर का खाना खाते-खाते ऊब होती है, तो बाहर खाने जाते हैं या नहीं? बताओ। आखिर कोई औरत कब तक एक ही आदमी को बर्दाश्त कर सकती है? चाहे वो फिर मैं ही क्यों ना हूँ ... ' सक्सेना मुस्कुरा रहा था।
'किन्तु सामाजिक वर्जनाओं का क्या? कैसे रविवार की सुबह तुम एक-दूसरे से नजरें मिला पाते होंगें? एक छत के नीचे कैसे रह पाते होंगें?' मैं ठेठ गँवई आदमी, चकरा गया था। मेरे भीतर के संस्कार अभी भी ये मानने को तैयार नहीं थे।'एक छत के नीचे कैसे रह सकते हैं? झूठ के सहारे।'
'झूठ के सहारे? कैसे?'
'तुम्हें एक बार का किस्सा सुनाता हूँ। ऐसी ही एक शाम, मेरी पत्नी के हाथ में आई एक टिपिकल बीमा एजेन्ट की चाबी। भारी भरकम कमीशन खाने वाला मालदार बीमा एजेन्ट और हमारी चाबी पहुँच गई एक बैंक मैनेजर की पत्नी के हाथ में। गजब की साँचे में ढली काया वाली मैनेजरनी, खुद भी कहीं नौकरी करती थी। बड़ा उत्तेजक माहौल था। हर कोई अलमस्त और बहका हुआ था। उस वक्त हम भी उत्तेजना में ऐसे डूबे थे मिसेज मैनेजर की कलाई पकड़कर, कि हमें होश ही नहीं था कि हमारी स्वयं की पत्नी का क्या हुआ? किधर गई? और चौहान, सच यार ... ' सक्सेना ने मेरी उत्सुकता को भाँपते हुए थोड़ा रुक कर फिर कहना शुरू किया '... बड़ी मादक रात थी वो मैनेजरनी क्या थी? बस बला थी। ऐसा संगमरमरी जिस्म ... मैंने पहले कभी नहीं देखा था। इतना चिकना और शफ्फाक बदन, ऐसी नपीतुली गोलाईयाँ ... ऐसा सपाट पेट ... इतने मासूम और पतले होंठ ... इतनी गहरी काली जुल्फें कि बस पूछ मत यार। लग रहा था, मानो सितारे टूट-टूट कर मेरे चारों ओर गिर रहे हैं। शी वाज वेरी मच कोआपरेटिव लेडी ... दोनों ही मानों कई जन्मों के प्यासे थे ... '
'फिर?' मेरा हलक सूख गया था, मैंने थोड़ा-सा थूक निगला और फिर एकटक सक्सेना का मुँह ताकने लगा।'... दूसरा दिन, रविवार का दिन। मैं सोया पड़ा था। उधर हमारी पत्नी की पलकें भी नींद से भारी थी, शायद रात भर वो भी जगती रही। करीब साढ़े दस बजे हाथ में चाय का प्याला लेकर, वो मेरे पास आई और बड़े प्यार से सिर पर हाथ फिरा कर मुझे जगाने लगी। मैं थोड़ी देर की ना नुकुर के बाद उठा और चाय पीने लगा। अभी दो एक घूँट ही ली थी कि पत्नी ने मुस्कुराते हुए व्यंग्य बाण छोड़ दिया, 'कैसी रही कल की रात? क्या-क्या हुआ?'बड़ा संवेदनशील प्रश्न पूछ बैठी पत्नी सुबह ही सुबह। मैं सोच में पड़ गया, 'क्या जवाब दूँ?' फिर अचानक खेंचकर पत्नी को बिस्तर पर भींच लिया और तड़ाक से एक चुम्बन जड़ दिया 'जाने भी दो रात की बात को। रात गई बात गई।'
'टालते क्यों हैं? बताओ ना।' बीवी ने मचलते हुए अपने को मेरी बाहों में लटका दिया। मेरी रात की स्मृति एकाएक ताजा होकर मस्तिष्क में जाग उठी। सफेद मखमल की सैर ... वाह! किन्तु मैंने जाहिर ना करते हुए तुरन्त रुख बदला, 'अब आगे से हम इस तरह के बेहूदा खेल में शरीक नहीं होंगें डॉर्लिंग।'
'पर उस मैनेजरनी के हाथ में अपनी चाबी आई देखकर तो उछल पड़े थे तुम। मानो कई जन्मों के भूखे को छत्तीस पकवान एक साथ दिख गए हों ... गजब की सैक्सी थी ना वो ... मन-मन भावै मुँडी हिलावै ... बेहूदा खेल में शरीक नहीं होंगें!' पत्नी ने मुँह बनाते हुए मेरा मखौल उड़ाया।
'लेकिन ये सच नहीं है, सविता।'
'जो सच है, वही कह रही हूँ। कैसे भूखे भेड़िये की तरह होठों पर जीभ फिरा रहे थे तुम उस समय?''क्यों तिल का ताड़ बना रही हो? पिनक में थे सब। माहौल में मस्ती थी। हम क्या अकेले थे? और सच कहूँ सवि, अजीब औरत थी, वो मैनेजरनी। दिखने की ही चमक दमक थी उसमें। मुँह से तो ऐसी बांस मार रही थी, मानो गटर का ढक्कन खुल गया हो।' मैंने सफाई देनी चाही।'किसको बेवकूफ बना रहे हो तुम? मैं सब जानती हूँ, जैसे तुम हो। अच्छा चलो, मुँह से बदबू आ रही थी, बाकी का शरीर तो खुशबूदार था कि नहीं?' पत्नी ने पतली गली में पकड़ लिया था हमें।मैंने फिर पलटी मारी, पत्नी के गालों को सहलाते हुए बोला, 'सवि, सच मानों, तुम्हें लगा होगा कि वो गजब की 'सैक्सी' थी। मुझे तो जरा भी नहीं लगी। लाख लीपापोती कर ले कोई, लोकट ब्लाऊज पहन ले या कुछ भी ना पहने ... तो भी तुम जैसी मासूमियत कहाँ से लाती भला वो? जैसी सहज, सुघड़, सुरुचिपूर्ण तुम हो, वो कतई नहीं थी। कोई भी औरत नहीं हो सकती।'
'सच?' पत्नी आत्मप्रशंसा सुनकर मुग्ध हो गई। तीर सही निशाने पर लगा था।'बिल्कुल सच' मैंने पुनः एक चुम्बन जड़ दिया उसके होंठों पर। स्मृति में पुनः पँखुडियों से 'वो' दो होंठ हिल उठे।'तो, क्या तुमने कुछ नहीं किया रात भर?'
...'ना' ...
'फिर रात कैसे कटी?' वो भी शातिर खिलाड़िन थी। खोद-खोद कर पूछ रही थी। पर हम भी तो कुछ कम नहीं थे।
'इधर-उधर की बातें करते रहे। वो अपने पति के अनुभव सुनाती रही ... मैं अपने सैल्समैनशिप के। बहुत बोलती थी वो ... '
'कुछ नहीं किया? पकड़ा-धकड़ी? किस-विस? नोंच-खसोंट?'
'तुम्हारे सिवा किसी और को छू भी लूँ, ऐसा गिरा हुआ मैं नहीं। मेरी हिम्मत भी नहीं, तुम तो जानती हो।'
' ... झूंठ ... '
'तुम्हारी कसम, सच।'
'रखो मेरे सिर पर हाथ ... '
'लो' मैंने धप्प् से उसके सिर पर हाथ रख दिया। उसके चेहरे पर अब संतोष की झलक थी। मैंने भी चैन की साँस ली।'मेरे बारे में तो तसल्ली कर ली तुमने, जरा अपनी भी तो बताओ। बीमा एजेन्ट के साथ खूब मौज मस्ती मारी होगी। क्यों? कहाँ ले गया था, तुम्हें?' अब मेरी बारी थी और पत्नी फँस गई थी।'कैसा उल्लू का पट्ठा था, क्या बताऊँ? जानते हो उसने पहले ही से एक होटल में कमरा बुक करवा रखा था। मैं तो बिल्कुल डरी हुई थी। कमरे में पाँव धरते ही जैसे मानो पावों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। जगमग करते कमरे में बैड़ के पास शराब की बोतलें रखी थी और सिगरेट के पैकेट पड़े थे। मैं तो मन ही मन भगवान को याद करने लगी। भगवान ने तुरन्त मंत्र दिया, 'इसकी पत्नी के बारे में बात करो।' वही किया। बैठते ही उसकी पत्नी का जिक्र छेड़ बैठी, मानो किसी ताजा घाव में उंगली घुसेड दी हो। कैसे-कैसे पत्नी उसे परेशान करती है? सब बखान करने लगा। रोता जाए, पीता जाए। पीता जाए, रोता जाए ... बस पीते-पीते और रोते-रोते कब लुढ़क गया, कुछ पता ही नहीं चला और मैं पौ फटते ही टैक्सी ले यहाँ चली आई, तुम्हारे पास।' ...मैं सब ताड़ रहा था। जैसा सच मेरा, वैसा सच उसका। खैर, मैंने चुटकी ली, 'फिर तो तुम भी मेरी बुराईयाँ गिना गिना कर रोने लगी होगी। क्यों?''ऐसी लगती हूँ मैं तुम्हें?' वो जरा-सा नाराज हो गई।'तुम तो ऐसी नहीं लगती। पर वो साला बीमे वाला इतना शरीफ नहीं लगता मुझे, जो हाथ में आए शिकार को छोड़ दे, रोने-धोने में।'
'तुम्हारी कसम डार्लिंग। कुछ भी तो नहीं किया उस बीमा एजेण्ट ने और अगर करना भी चाहता तो तुम क्या सोचते हो, मैं करने देती? भारतीय नारी हूँ ... जान दे दूँगी पर आंचल नहीं सरकने दूँगी, किसी के सामने ...-'
'पर तुम्हारे हाथ में अपनी चाबी आ गई जानकर कैसे लपक कर तुम्हारी कमर में हाथ डालकर अपनी ओर खेंच लिया था उसने। तुम भी तब शरमाकर मुस्कुराई थी। कहो। नहीं?''हाँ ... लेकिन यकीन मानो इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ ... '
'तुम्हारे जिस्म के पेचोखम नहीं देखे उसने? तुम्हारी ऑंखों के सुर्ख डोरे तो चुगली कर रहे हैं कि रात भर बड़ी तेज ऑंधी में खड़ी रही हो ऑंखें फाड़े ... ये गंदुमी गुदाज जिस्म उस साले के नीचे से यूँ ही सरक आया हो, यकीं नहीं आता ... ' मैं मुस्कुरा रहा था।'कैसी बातें करते हो तुम?' वो नजरें मिलाने से कतरा रही थी। 'दो जवान बदन रात भर एक कमरे में, एक बिस्तर पर रहें और बिस्तर पर सिलवटें तक ना आई हों ... मैं नहीं मान सकता।'
'छि: कैसी बातें करते हो अपनी पत्नी से। शर्म नहीं आती तुम्हें। तुम्हारे अलावा किसी ओर के बारे में सोच भी नहीं सकती मैं। और तुम हो कि ... ' इस बार पत्नी रूँआसी हो गई।
'इसका मतलब जनाब केवल रोते रहे और पीते रहे, पीते रहे और रोते रहे ... बस।'
'हाँ ... ' उसने जोर देकर कहा।
'खाओ मेरी कसम ... ' उसने भी धप्प से अपना हाथ मेरे सिर पर रख दिया। पूरा माहौल मानो व्यंग्य से मुस्कुराने लगा। और हम दोनों आलिंगनबध्द हो गए। ... पूरा कमरा घूमने लगा।'मैंने कसम तो उठवा ली थी चौहान, पर मैं जानता था कि वो भी मेरी तरह झूठी कसम खा रही थी। तन्हाई, जो गुनाहों की हिम्मत बढाती है। कितनी देर पत्नी को 'स्त्री' होने से रोक सकी होगी। जब मैं ही पत्नीव्रत नहीं निभा पाया, तो वो कब तक पतिव्रत निभा पाई होगी? बदला हुआ जायका किसको बुरा लगता है? और फिर एक पंचसितारा होटल के तन्हा अकेले कमरे में एक मर्द के साथ सारी रात सत्यनारायण की कथा तो सुनी नहीं जा सकती ... क्यों?' कहकर सक्सेना ने जोर का ठहाका लगाया और एक ही घूँट में पूरा पैग गटक गया। मैं उसके मुँह की तरफ देखता रह गया, अवाक्।(समाप्त)
Monday, July 03, 2006
जुलाई की कहानी: "हम एक से"
कहानी: हम एक-से
रेडियो स्टेशन से रिकॉर्डिंग के बाद ऑफिस के लिए निकला था। मोड़ से देखा बस आ रही है। मैं दौड़ पड़ा। बड़ी मुश्किल से बस पकड़ पाया। बस खचाखच भरी थी। लेकिन बस को छोड़ने का अभिप्राय था, अगले एक घण्टे तक तपती दोपहर में बीच सड़क बेबस खड़े रहना और चूँकि मैं ऑफिस से छुट्टी लिए बिना रिकॉर्डिंग के लिए आया था, इसलिए भी मेरा इसी बस से जाना आवश्यक था। नाहक किसी को कुछ कहने का अवसर देने से अच्छा है, थोड़ा कष्ट सह कर टाईम से पहुँच लिया जाए। जैसे-तैसे, भीड़ में घुसा और एक जगह छत का पाइप पकड़कर खड़ा हो गया। खचाखच भरी बस में गर्मी के मारे लोगों का बुरा हाल हो रहा था।
रेडियो स्टेशन से रिकॉर्डिंग के बाद ऑफिस के लिए निकला था। मोड़ से देखा बस आ रही है। मैं दौड़ पड़ा। बड़ी मुश्किल से बस पकड़ पाया। बस खचाखच भरी थी। लेकिन बस को छोड़ने का अभिप्राय था, अगले एक घण्टे तक तपती दोपहर में बीच सड़क बेबस खड़े रहना और चूँकि मैं ऑफिस से छुट्टी लिए बिना रिकॉर्डिंग के लिए आया था, इसलिए भी मेरा इसी बस से जाना आवश्यक था। नाहक किसी को कुछ कहने का अवसर देने से अच्छा है, थोड़ा कष्ट सह कर टाईम से पहुँच लिया जाए। जैसे-तैसे, भीड़ में घुसा और एक जगह छत का पाइप पकड़कर खड़ा हो गया। खचाखच भरी बस में गर्मी के मारे लोगों का बुरा हाल हो रहा था।
मुझसे कुछ दूरी पर एक पतली-दुबली युवती, खिड़की का सहारा लिए खड़ी थी। उसके एक हाथ में पॉलिथीन का एक बैग था और दूसरे हाथ से उसने खिड़की को कसके पकड़ा हुआ था। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि वो लोगों की बीच बुरी तरह फंसकर खड़ी थी। कोई और स्थान होता तो शायद वो इस तरह नहीं खड़ी होती, परन्तु महानगरीय बस सेवाओं में सफर करना इतना कष्टकर हो गया है कि वर्जनाएँ आप से आप टूट गयी हैं और व्यक्ति अति समझौतावादी हो गया है।
मैं भीड़ में से किसी तरह बार-बार उचक कर बस से बाहर झाँक रहा था, ये देखने के लिए कि अभी और कितना दूर है ऑफिस? तभी उस पास खड़ी युवती की आवाज मेरे कानों में पड़ी 'एक्सक्यूज मी प्लीज, टाईम क्या हुआ है?' मैंने इधर-उधर देखा, ये देखने के लिए कि ये टाइम किससे पूछा गया है? सभी को अपने-अपने में व्यस्त पाकर जब मैंने उस लड़की कि तरफ देखा तो वह मेरी ओर ही प्रश्नभरी निगाह से देख रही थी। मैं अभिप्राय समझ गया और भीड़ में से कलाई को ऊपर खींच कर टाइम बताया, 'पौने दो'। उसने मुस्कुराकर 'थैंक्यू' बोल दिया। अब, मेरा ध्यान उसकी ओर गया। यूँ भी अभी ऑफिस आने में देर थी। सो मैं नजर बचा-बचा कर उसे देखने लगा। उसने पीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था। गले में हल्के नीले रंग का दुपट्टा पड़ा था। चेहरे पर अजब सौम्यता मिश्रित सुन्दरता थी, ऑंखें बड़ी-बड़ी और नाक नुकीला था। गेहुँआ रंग के चेहरे पर दोनों भौहों के बीच छोटी-सी काली बिन्दिया आकर्षक लग रही थी। पसीने की बारीक-बारीक बूँदों से सजा उसका चेहरा किसी ओस नहाये फूल जैसा लग रहा था। मैं 'उसी' में खोया था कि उसने मुझे इस तरह 'ताकते हुए' देख लिया। दोनों की नजरें मिली, वो मुस्कुरा दी। मैं बुरी तरह झेंप गया। 'क्या सोचती होगी? टाईम क्या पूछ लिया, लगा घूरने। बदतमीजों की तरह।' मैं पुनः बस के बाहर झाँकने लगा। लेकिन उसका आकर्षण ऐसा था कि बार-बार ध्यान दौड़कर उसी की ओर चला जाता। मैं उसे देखता तो उसको अपनी ही ओर देखता पाता, नजर मिलते ही वो मुस्कुरा देती और नजरें घुमा लेती। दो-एक बार इस तरह हुआ, तो मन से झिझक जाती रही, और हम रह-रह कर एक-दूसरे को देखने लगे।
अचानक कण्डक्टर चिल्लाया 'सैकेट्रेट ... सैकेट्रेट वाले आ जाओ।' मैं जैसे चौंक कर बोला, 'हाँ-हाँ ... रोको। बस की रफ्तार धीमी हुई और होते-होते बस रुक गई। मैं भीड़ को धकेलता हुआ बस से उतर पड़ा। उतर कर देखा तो 'वो' भी मेरे पीछे-पीछे ही उतर आई थी। मैं चकित रह गया। मैं कुछ और सोचता उससे पहले ही वो बोल पड़ी, 'आप, क्या यहीं काम करते हैं?'
'जी हाँ, इसी ऑफिस में अदना-सा मुलाजिम हूँ' मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
'तब तो आप रामगोपाल त्रिपाठी जी को जानते होंगें' उसने जरा जिज्ञासा से पूछा।
'हाँ, हाँ, त्रिपाठी जी के ऑफिस में ही तो मैं हूँ' मैंने अवगत कराया। फिर जरा रुककर पूछा 'आप त्रिपाठी जी को कैसे जानती हैं?'
'जी, वो मेरे अंकल लगते हैं।'
'लेकिन अभी तो लंच टाईम है, वो घर गये होंगें' चलते-चलते मैंने बताया।
'क्या? कितनी देर में आ जाएँगे, लगभग?' उसके स्वर में त्रिपाठी जी से नहीं मिल सकने का अफसोस साफ नजर आ रहा था।
'बस आने ही वाले होंगे' मैंने घड़ी देखते हुए कहा। दो बज कर दस मिनट हो चुके थे। त्रिपाठी जी अमूमन ढाई, पौने तीन तक आ जाते हैं।
'चलिए तब तक एक-एक कप कॉफी हो जाए' मैंने साथ ही जोड़ दिया। वो स्वीकृति में मुस्कुरा दी। हम एक चौड़े दालान को पार करके केण्टीन की ओर बढ़ गये।पहाड़ी छोकरा दो कॉफी दे गया था। धीरे-धीरे कॉफी पीते-पीते हम बातें कर रहे थे। उसने पूछा, 'मैंने आपको रेडियो स्टेशन से निकलते हुए देखा था। वहाँ कैसे?'
'कुछ नहीं, वहाँ मेरी एक रिकॉर्डिंग थी। छुट्टी लेने की बजाए, लंच-टाईम से कुछ पहले निकल गया था।' मैंने टालने के-से अंदाज में जवाब दिया।
'रिकॉर्डिंग? आप गाते हैं?' वो चकित थी।
'जी नहीं, गाता नहीं हूँ। लिखता हूँ। मेरी कविताओं की रिकॉर्डिंग थी।'
'आप लिखते हैं? कब से लिख रहे हैं?' वो अब धीरे-धीरे अनौपचारिक हो रही थी।
'यूँ ही थोड़ा-बहुत लिख लेता हूँ। पहले शौकिया लिखता था, फिर आदतन लिखने लगा और अब मजबूरन लिखता हूँ।' मैंने कॉफी का एक घूँट भरते हुए कहा। बात कहीं भीतर से निकली थी, सुनते ही 'वो' गम्भीर हो गई।
'मजबूरन क्यों?' उसने पूछा। प्रश्न में गम्भीर जिज्ञासा थी।
'क्लर्क की पगार कितनी होती है? जानती ही होंगी। उसमें घर चलाना बहुत ढेढ़ी-खीर होती है, मैडम। रेडियो स्टेशन में कुछ मिलने-जुलने वाले लोग हैं, उनके जरिये महीने-दो महीने में एक दो कार्यक्रम हो जाते हैं। थोड़ा कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन से मिल जाता है। बस गुजारा हो जाता है। इसे 'मजबूरन लिखना' नहीं कहूँ तो क्या कहूँ?' मैं हँसने की चेष्टा करने लगा। मगर मैं जानता था कि मैं विफल हो रहा हूँ। क्योंकि मेरी हँसी मेरे चेहरे के भावों से कतई मेल नहीं खा रही थी। वो अभी भी पहले जैसी गम्भीर बैठी थी।
'घर में कौन-कौन हैं?'
'बूढे माँ-बाप हैं और दो बहिनें हैं।'
'आपकी शादी ... ' उसने थोड़ा झिझकते हुए प्रश्न किया।
'जिस भाई की दो-दो जवान बहिनें घर में बैठी हों, उसकी शादी करना ना तो उचित है और ना ही आवश्यक।' वेटर कप लेने आ गया था, उसको दस का नोट थमाते हुए मैंने कहा।
'ऐसा क्यों सोचते हैं आप? ये क्यों नहीं सोचते कि माँ-पिताजी को बेटियों के जाने के बाद अकेलापन नहीं खलेगा। उनका मन बहला रहा करेगा।' इस बार वो हल्का-सा मुस्कुरायी भी।
'ये सब कहने की बातें हैं। घर में खाने वाला एक पेट और बढ़ जाएगा, ये नहीं दिखता आपको? उसके पीछे फिर और कितने खाने वाले बढते हैं, ये नहीं नजर आता? यूँ भी देश की आबादी कम नहीं है। मेरा शादी नहीं करना मेरे साथ साथ देश के हित में भी है, ये क्यों नहीं सोचती आप?' मैंने बात को मजाक में उड़ाने का प्रयास किया और इस बार सफल भी हो गया।
'आप तो ... ' वो हँस पड़ी।
'त्रिपाठी जी से क्या काम था?' मैंने तुरन्त बात का रुख मोड़ दिया।
'त्रिपाठी जी मेरे पापा के दोस्त हैं। एक ट्राँसफर कैंसिल करवाना है। उसी सिलसिले में त्रिपाठी जी से मिलना था' उसने प्रयोजन बताया। तभी मुझे दूर से त्रिपाठी जी आते हुए दिखाई दे गये। मैंने ईशारे से उसको बता दिया। वो उठकर उस और चल पड़ी। त्रिपाठी जी ने उसे गले से लगा लिया और अपने साथ लेकर अन्दर की ओर बढ़ गए। मैं उन्हें जाता हुआ देखता रहा, उसने पलट कर नहीं देखा।
कुछ देर बैठे रहने के बाद उठकर मैं भी ऑफिस की ओर बढ़ गया। वो त्रिपाठी जी के सामने वाली कुर्सी पर बैठी थी। दरवाजा खुलने की आवाज से चौंक कर दोनों का ध्यान मेरी तरफ गया। त्रिपाठी जी यथावत थे, अभ्यस्त जो थे। हाँ, वो धीरे से मुस्कुरा दी। मैं चुपचाप जाकर अपनी टेबिल पर बैठ गया और कुछ देर फाईलें इधर-उधर करने के बाद एक कागज टाईप करने लगा। हालाँकि मेरी उंगलियाँ टाईपराइटर पर चल रही थी, मगर मेरे कान उनकी बातों पर लगे हुए थे।
'अंकल, काम तो यहाँ भी करना है और वहाँ भी। बस फिक्र है तो माँ की। आजकल उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं रहती।'
'क्या भाभी जी की तबियत में कोई सुधार नहीं है?' त्रिपाठी जी चिन्तित हो उठे।
'पहले से तो बेहतर है, अंकल। लेकिन अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं है। हो भी नहीं सकती, आप तो जानते ही हैं। पता नहीं भगवान को क्या मंजूर है?' उसका स्वर उदास था।
'नहीं, बेटे। यूँ हिम्मत नहीं हारा करते। भगवान पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा, और फिर जिस माँ की तुम जैसी बहादुर बेटी हो उसको कभी कुछ हो सकता है भला?'
'बस, ये ही वजह है अंकल। वरना काम तो काम है, जहाँ मिलेगा करना ही पड़ेगा। फिर सरकारी नौकरी में तो यूँ भी बिस्तर बाँधे रहना चाहिए। पापा को तो आप जानते ही हैं। वो और उनके मरीज बस उनकी दुनिया तो वहीं तक है। भैया अहमदाबाद के होकर रह गये हैं। उन्हें घर परिवार से शायद कुछ लेना-देना नहीं है। अनुश्का अभी छोटी है। पढ रही है, उस पर अभी से क्या जिम्मेदारी डालें। वो अपना कर लेती है, वही बहुत है। ऐसे में माँ की देखभाल करने वाला घर में कोई नहीं है, अंकल।' वो रुँआसी हो गई थी। मैंने नजर उठा कर देखा, वो रूमाल से ऑंखें पौंछ रही थी।
'बस, बस, ऐसे दिल छोटा नहीं करते। तुम तो बहुत बहादुर लड़की हो, तुम्ही यूँ भावुक हो उठोगी तो भाभी जी को कौन सम्हालेगा? बेटे, अपने दुख को छुपाकर दूसरों के दुख को भोगना ही तो सच्चा पुण्य है। मैं क्या नहीं जानता किस तरह अभिषेक शादी के बाद अलग होकर अहमदाबाद जा बसा। क्या उसका यही फर्ज बनता था, एकलौता बेटा होने के नाते? तेरे पापा, बेटे जानती हो बहुत महान हैं। वो खुद क्या दुरूखी नहीं हैं बेटे के व्यवहार से? उसने क्या इसी दिन के लिए सपने सजाये थे? अब जब सेवा करने के लिए घर में बहू होनी चाहिए, उस वक्त बेटी पर आश्रित माँ का पति कितना विवश होता है? तुम समझ सकती हो। हालाँकि रुपये पैसे की कोई परेशानी नहीं है, मगर अपनों की देखभाल भी तो कुछ माने रखती है जिन्दगी में। ऐसे में वो मरीजों को स्वस्थ करने में अपने को झौंके हुए है और खुद एक अदेखे रोग का मरीज होता जा रहा है, भीतर ही भीतर। उसके जैसा आदमी कहाँ पाओगी, बेटा?तुमको गर्व होना चाहिए अपने पापा पर, जो इतना कुछ सहने के बावजूद भी कुछ कहते नहीं हैं। बस, चुपचाप खून के घूँट पीते रहते हैं।' त्रिपाठी जी भी भावुक हो उठे थे।
'मै समझती हूँ, अंकल। पापा अपनी जगह सही हैं। तभी तो उनसे कुछ कहते नहीं बन पड़ता। उन्होंने तो मुझे ट्राँसफर कैंसिल करवाने को भी नहीं कहा। कह रहे थे कि अनुश्का देख लेगी माँ को। पर अंकल अनुश्का का अब के अन्तिम वर्ष है, बीण्एण् का। उसकी परिक्षाएँ भी सिर पर हैं। उसकी पढ़ाई में हर्ज होगा। मैं उसको इस समय पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं करने देना चाहती।'
'मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ, बेटे। तुम जैसी समझदार और गुणी बेटी भगवान सभी को दे। तुम अपनी एप्लीकेशन दे आओ। मैं 'डिजायर' करवाकर तुम्हारा ट्रांसफर कैंसिल करवा दूँगा। बेफिक्र रहो। दो चार दिन में तुम्हें ऑर्डर पहुँच जाएँगे।' कहकर वो मेरी तरफ मुखातिब हुए। वो ऐसा ही करेंगें, मैं जानता था इसलिए मैं और अधिक ध्यान से टाईप करने लगा। 'संदीप, सुनो जरा' उन्होंने पुकारा, युवती भी घूमकर मेरी ओर देखने लगी।
मैं उठकर त्रिपाठी जी की टेबिल के पास आकर खड़ा हुआ। मेरे हाथ में नोटबुक और पेन था, 'जी, सर।' मैंने धीरे से कहा। 'संदीप, ये प्रतीक्षा है। मेरी बेटी जैसी है। नगर निगम में जूनियर इंजिनियर की पोस्ट पर है। इसका ट्राँसफर किसी कारणवश अलवर से उदयपुर कर दिया गया है। लेकिन इसकी माँ सीरियस है। सो ये उदयपुर जाने में असमर्थ है। इसके ट्रांसफर को कैंसिल करना है। इस आशय की एक एप्लीकेशन टाईप कर लाओ जल्दी से।' उन्होंने संक्षिप्त में काम समझाया।'हाँ' कहते हुए मैंने एक नजर उसको देखा और चल दिया।
थोड़ी ही देर बाद मैंने टाईप्ड़ एप्लीकेशन ला कर त्रिपाठी जी को दे दी। त्रिपाठी जी ने उस पर उसके दस्तखत कराये, कुछ 'रिमार्क' लिखा और अपने पास ही रख लिया। अब उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे। त्रिपाठी जी ने उसको घर चलने के लिए कहा, तो उसने माँ की तबियत का हवाला देते हुए असमर्थता जता दी। त्रिपाठी जी ने अधिक जोर नहीं दिया। जाते हुए वो मेरे पास आकर रुके और बोले, 'संदीप, प्रतीक्षा को जरा बस स्टैण्ड तक छोड़ आओगे?'
'हाँ' मैंने हामी भरी।
'नहीं, कोई जरूरत नहीं है इसकी। बेवजह इनको तकलीफ होगी, अंकल'। उसने विरोध किया।
'कोई तकलीफ नहीं होगी, ये तुम्हें बिठा आएगा।' त्रिपाठी जी ने कहा।वो कुर्सी से उठ खड़ी हुई, 'थैंक्यू अंकल, थैंक्यू वैरी मच फॉर दिस प्रोम्प्ट हैल्प।' त्रिपाठी जी ने उसको सीने से लगा लिया, 'इसमें थैंक्यू की क्या बात है? नीलिमा में और तुम में कोई अन्तर है क्या? मेरे लिए तुम दोनों ही बेटियाँ हो। आराम से जाना, संदीप तुम्हें बिठा देगा। पहुँच का पत्र देना और तेरे बाप को कहना कि कभी कभार एकाध फोन कर लिया करे।' कहते कहते वो उसकी पीठ थपथपाने लगे।
बस के जाने में काफी देर थी अभी, हम एक तरफ बैंच पर बैठ गए। स्थान हालाँकि एकान्त तो नहीं था पर कम भीड़भाड़ वाला अवश्य था। मैंने बैठने के कुछ देर बाद बात शुरू की, 'आपने उस वक्त बताया क्यों नहीं कि आप नगर निगम में जूनियर इंजिनियर हैं और अपना ही ट्राँसफर कैंसिल करवाने आई हैं।'
'ये तो मैंने बताया था ना कि मैं ट्राँसफर कैंसिल करवाने आई हूँ। हाँ, जूनियर इंजिनियर हूँ और अपने ही ट्राँसफर के सिलसिले में आई हूँ, ये जरूर नहीं बताया था मैंने। सो, उससे क्या फर्क पड़ता है?' उसने मुस्कुराते हुए कहा।
'फर्क क्यों नहीं पड़ता? मैं अनजाने में ना जाने क्या-क्या बकता रहा?' मैंने अपनी हथेली को गौर से देखते हुए कहा, शायद उससे नजरें बचाकर। 'ऐसा तो कुछ आपने कहा नहीं, जिससे मैं बुरा मानूँ।' उसने ऐसे लहजे में कहा कि मैं हँस दिया। 'हाँ, कहते तो शायद बुरा मान जाती।' वो भी हँस पड़ी। कैसी निर्मल हँसी? मैं देखता रह गया।
'आपकी माँ की तबियत को क्या हुआ है?' मैंने विषय बदलते हुए पूछा तो वो एकाएक गम्भीर हो गई, बिल्कुल ठहरी हुई झील-सी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा 'कैंसर ... ब्लड कैंसर है, मम्मी को।' मैं एकदम चौंक पड़ा, 'क्या?'
'जी हाँ, मम्मी को ब्लड़ कैंसर है।' वो बेहद शान्त थी। कौन कह सकता था कि यही लड़की कुछ देर पहले खिलखिलाकर हँस रही थी? मैं, निर्वाक्।
'पापा डॉक्टर हैं, अपने काम में व्यस्त। बड़े भैया अहमदाबाद में रहते हैं, छोटी बहिन पढ़ रही है बीण्एण् में। ऐसे में मम्मी की देखरेख के लिए मेरा वहाँ होना बहुत आवश्यक है इसीलिए त्रिपाठी अंकल से ट्राँसफर कैंसिल करवाने की रिक्वेस्ट की है।' वो मुस्कुराने की कोशिश करती हुई बोली। 'प्रतीक्षा जी, आप वाकई बहुत हिम्मत वाली हैं। हर किसी के वश का नहीं है इतना त्याग।' बरबस ही मेरे मुँह से निकल पड़ा।
'क्यों नहीं है? आप जो हैं, जीते जागते उदाहरण। जो अपने परिवार और परिवार वालों के लिए इतना कष्ट झेल रहे हैं। अपनी भावनाओं का दमन किए हुए हैं। ये क्या कम त्याग है?''मैं पुरुष हूँ, प्रतीक्षा जी। मेरी भावनाओं का होना, नहीं होना कुछ खास अर्थ नहीं रखता। आप स्त्री हैं। जीवन की विषमताओं को अकेले सहन कर पाना स्त्री के लिए कितना चुनौतीपूर्ण होता है, जानती हैं? ऐसे में इतनी पीड़ा अकेले सहना, और वो भी निरूशब्द। वन्दनीय हैं, निस्संदेह।'
'दुःख कभी स्त्री और पुरुष का भेद नहीं करता संदीप जी। मेरा दु:ख ये नहीं है कि मुझे अपनी भावनाओं की कीमत पर अपनी माँ को बचाना है, बल्कि ये है कि मेरा भाई अपनी माँ की कीमत पर अपनी भावनाओं को जिलाए है। क्या उसका कोई फर्ज नहीं था? मैं इसीलिए ही शादी-ब्याह के झंझट में नहीं पड़ना चाहती। क्योंकि, अगर मैं भी पराये घर चली गई तो मेरे माँ-बाप का क्या होगा? बस अनुश्का के हाथ पीले हो जाएँ ... यही मेरी खुशी है ... ' कहते-कहते उसका गला भर आया, ऑंखें नम हो गई।
'प्रतीक्षा ... प्रतीक्षा ... क्या हुआ? ऐसे नहीं करते। सब ठीक हो जाएगा।' मैंने उसे चुप कराने को उसके सिर पर हाथ रखा, उसने चेहरा मेरे कंधे पर टिका दिया। मैंने चुपचाप उसे अपनी बाँहों में सहेज लिया और वो अबोध बच्चे की तरह फफकने लगी। ना जाने वो कितनी देर रोती रही, मैं जड़ बना बैठा रहा।
... उसकी बस जाने वाली थी, वो खिड़की वाली सीट पर बैठी थी। मैं बाहर खड़ा था। दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे। निरूशब्द एक-दूसरे को देख रहे थे। उसकी ऑंखों की नमी में मुझे किसी आश्वासन की चाह तैरती दिखी। मैंने मुस्कुराकर धीरे से पलकें झुकाकर उसे आश्वस्त किया, मानो कह दिया हो कि 'प्रतीक्षा मैं तुम्हारे साथ हूँ।' वो जैसे जी उठी हो। उसने दुपट्टे से ऑंखें पौंछ ली और अनुग्रह भरी निगाहों से मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी। तभी बस चल पड़ी। मैं खड़ा रह गया, बस बढ़ गई। दो हाथ हवा में एक-दूसरे की ओर हिलते रह गये।(समाप्त)
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